मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

Nation for farmer campaign

 Nation for farmer campaign

A webinar organized by agri desk.

. Presentation

.वर्तमान में पारिस्थितिकी खेती एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

Agro ecosystem is a crucial issue today. इस बात के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि पारिस्थितिकीय खेती उत्पादन , वर्तमान (आधुनिक)खेती उत्पादन प्रणाली का विकल्प हो सकता है जो लंबी अवधि तक बने रह सकता है। निर्बाध खाद्य आपूर्ति कर सकता है। जलवायु परिवर्तन के संकट को झेल सकता है।

इस विषय की गहराई तक समझ विकसित करने के लिए कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर प्रोफेसर पार्थिव बसु की प्रस्तुति के सारांश बिंदुओं को क्रमवार समझें।

प्रस्तुति :-- 1. लंबी अवधि के लिए वहनीय खेती उपज के लिए पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा प्रदत सेवाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं समझें।

2. पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर जलवायु परिवर्तन का कितना कुप्रभाव है ,यह भी समझें

3. पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को कैसे धारण करें और बनाए रखें।

प्रस्तुति के उपरोक्त मुख्य तीन बिंदुओं के अंतसंबंधों को समझने के लिए विवरण इस प्रकार है।

डाक्टर प्रोफेसर पार्थिव बसु का कहना है कि जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी खेती तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है । इस गंभीर चुनौती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज के दिन विश्व में 80 करोड लोग भुखमरी का शिकार हैं और 18 करोड़ बच्चे कुपोषण ग्रस्त हैं ।दूसरी तरफ खाद्य पदार्थों की मांगों में लगातार बढ़ोतरी के चलते 2050 तक 70% तक बढ़ोतरी का अनुमान है ।इसका मतलब खेती उत्पादन महत्वपूर्ण है और इसके उत्पादन के लिए कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। वर्तमान खेती उत्पादन को लगातार बढ़ाने की जरूरत है। आधुनिक खेती यानी पूंजीवादी खेती में यह गुंजाइश नहीं बची है। अतः हमें संवहनीय पैदावार लेने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास(decline) को रोकना

1. वहनीय खेती के विकास में पारिस्थितिकी खेती सेवाओं (ecosystem services)का क्या महत्व है?

2. जलवायु परिवर्तन से परिस्थितिकी खेती सेवाओं पर क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं? Climate change, impact on ecosystem services.

3. परिस्थिति की खेती सेवाओं को बचाए और बनाए रखने के लिए इस विषय को किस प्रकार आत्मसात करें

इन विषयों को समझने के लिए मुख्य रूप से 2 बिंदु हैं

१.टिकाऊ सतत् कृषि उत्पादन (sustainable agriculture production)से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है। बढ़ती मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाकर ही रखना होगा।

२. अनिवार्य रूप से प्राकृतिक संसाधनों के विनाश को रोकना ही होगा।

1. उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए कुछ प्रबंधनात्मक उपाय करने होंगे।

अ. खेत का आकार । ब. खेत की जुताई । स. फसल विविधीकरण। द. फसल चक्र अपनाना। क. ढांपने वाली फसलें। इस कार्यप्रणाली से कृषि पारिस्थितिकी प्रणाली तंत्र विकसित होगा जो प्राकृतिक रूप से निम्नलिखित सेवाएं प्रदान करेगा।

कीट नियंत्रण होगा ।प्रागण क्रिया पूरी होगी। पोषक तत्वों की उपलब्धता का चक्कर बना रहेगा। भू संरक्षण होगा जिससे भूसंरचना और उसकी उर्वरकता बनी रहेगी। पानी गुणवत्ता युक्त पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता होगा। कार्बन पृथक्करण प्रक्रिया तेज होगी ।जैव विविधता बनी रहेगी।

इन प्राकृतिक सेवाओं से निम्नलिखित फल प्राप्त होंगे

! भोजन (food)!! रेशा ( fiber) !!! जैव शक्ति या उर्जा (Bio-energy)

अगर हम ऐसा ना करके आधुनिक (पूंजीवादी)खेती करते हैं तो निम्नलिखित हालात बनने लाजमी हैं।

-जैव विविधता खत्म हो जाएगी।

-जंगली जानवरों के रहने के ठिकाने खत्म हो जाएंगे।

-पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा नहीं मिल पाएगी।

-पानी के स्रोत बंद होने लगेंगे।

-कीटनाशकों का प्रयोग और मात्रा बढ़ जाएगी।

-ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन बढ़ जाएगा।

-पारिस्थितिकीय तंत्र की सेवाओं में भारी गिरावट आएगी।

क्योंकि जमीन के ऊपर और नीचे की जैव विविधता खत्म होने से असंतुलन की स्थिति पैदा होगी। बहुत सारे कीट- पतंग नहीं रहेंगे। शाकाहारी कीटों को नियंत्रण करने के लिए मांसाहारी कीटों की संख्या लगभग खत्म हो जाएगी।

निष्कर्ष :-जैव विविधता के अंतसंबंधों को समझना।

जैव विविधता >>>>परिस्थितिकी कार्यप्रणाली तंत्र विकसित होगा>>>>परिस्थितिकी तंत्र से जो सेवाएं उपलब्ध होंगी>>>> लक्ष्य >मानव कल्याण।

2. जलवायु परिवर्तन का कृषि पारिस्थितिकी उत्पादन तंत्र पर गहरा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है ।समग्र रूप में कुल स्थिति को समझना जरूरी है। हम जानते हैं कि 85% परागण कार्य में कीटों का ही रोल होता है। उष्णकटिबंधीय इलाकों में धरती के तापमान बढ़ने से कीटों का भारी नुकसान हुआ है।

मौसमी तापमान में वृद्धि से पौधों और पशुओं के वार्षिक चक्कर पर काफी प्रभाव पड़ा है ।पेड़ पौधे तापमान में वृद्धि से (परिवर्तन से ) अपने फूल और फल का उत्पादन समय से पहले करने लगते हैं, तो परागण क्रियाओं में सहायक कीटों का प्रजनन प्रभावित होता है। इस प्रकार कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आएगी ।शाकाहारी और मांसाहारी कीटों की अनुपातिक संख्या में असंतुलन पैदा हो जाएगा।

तापमान वृद्धि से जमीन के ऊपर और अंदर की जैव- विविधता गहरे से प्रभावित होती है । हवा और धरती की गुणवत्ता का भी जैवविविधता पर काफी असर पड़ता है। स्वस्थ जमीन बनना जैव विविधता पर निर्भर करता है । जो कार्बनिक पदार्थों को सहेज कर रख सकती है। कार्बन पदार्थ पेड़ पौधों के लिए अंकुरित होने के समय सबसे ज्यादा जरूरी खुराक मानी जाती है। अतः कृषि उपज को प्राकृतिक संसाधनों के साथ ही बढ़ा सकते हैं और बनाए भी रख सकते हैं।

! अतः रासायनिक खेती को कम करना या बंद करना ही होगा।

!! परागण कीटों को आकर्षित करने और बचाए रखने के लिए जंगली पेड़ पौधों के पैदा होने की स्थितियों को बचाना होगा।

!!! सामुदायिक जमीनों पर वनस्पति बाड़े उगाने के लिए कुछ उपाय सोचने होंगे।

!!!! मांसाहारी कीटों की स्थिति में सुधार करना होगा इसके लिए खेत का विविधीकरण करना होगा । प्राकृति-संसाधनों के संरक्षण और बनाए रखने के प्रयास करने होंगे

अतःअब समय है, जलवायु हितैषी कृषि अपनाने का। आओ इस पर काम शुरू करें! इस बात के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि कृषि पारिस्थितिकी तंत्र Agroecosystem)ही खाद्य सुरक्षा की गारंटी है।

जय किसान जय विज्ञान! जय विज्ञान जय संविधान!!

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