मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

जनतंत्र का अनूठा प्रयोग है किसान आंदोलन

 जनतंत्र का अनूठा प्रयोग है किसान आंदोलन


किसान आंदोलन को लेकर सत्तापक्ष की ओर से जो दलीलें दी जा रही हैं, वे कारगर नहीं हो पा रही हैं क्योंकि ज़मीनी वास्तविकता कुछ और ही है। सत्ता पक्ष का कहना है कि किसानों को भ्रमित कर दिया गया है और विपक्षी राजनीतिक दल उन्हें विरोध के लिए लामबंद करने में लगे हुए हैं। यह भी दलील आई है कि इसमें राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए और सामाजिक तथा राष्ट्र विरोधी तत्त्व शामिल हो गए हैं और आंदोलन को भड़काने में लगे हुए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि केवल हरियाणा और पंजाब के किसान ही आंदोलन में भाग ले रहे हैं। इन सब बातों को कहकर वे न केवल आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं बल्कि किसान-विरोधी भी बता रहे हैं क्योंकि किसानों की ज़मीन, उनकी पैदावार आदि के लिए 'खुला बाज़ार' उपलब्ध करवाना तो किसानों के हित में ही है और 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' तथा 'सरकारी मंडियों' में खरीद तो जारी ही रहेगी तो फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनाने की क्या ज़रूरत है, यानी सत्तापक्ष ने 'हमेशा की तरह' किसानों के हित में कानूनों का निर्माण किया है और वे (किसान) नहीं जानते कि उनकी भलाई क्या है। देशव्यापी प्रचार के सशक्त माध्यमों के ज़रिये सत्तापक्ष किसानों को समझाने और विपक्ष को किसान-विरोधी बताने की भरसक कोशिशें कर रहा है लेकिन आंदोलन स्थलों पर भयंकर सर्दी में अलाव के इर्द-गिर्द रात गुज़ारते किसानों की बात कुछ और ही है! लाखों की संख्या में दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसान संसद का विशेष सत्र बुलाकर तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। निरक्षर, अल्प साक्षर, शिक्षित तथा उच्च शिक्षित किसान; युवा-महिला-बुजुर्ग किसान; जाति, धर्म और इलाकों की तमाम सीमाओं को लांघता किसान; आत्मविश्वास, अपार धैर्य, अद्भुत मनोबल और आत्मानुशासन में बंधा कतारबद्ध किसान देश की रीढ़ होने का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत कर रहा है। किसानों का कहना है कि सत्ता पक्ष की दलीलें देश को भ्रमित करने का प्रयास हैं। किसान तो समझ रहा है कि सत्ता की मंशाएं क्या हैं। उनका कहना है कि राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक, तमिलनाडू तक के किसान संगठनों का समर्थन उनके साथ है और इन प्रांतों से किसानों के जत्थे पहुंच रहे हैं। आंदोलन में हिस्सा लेने वाले किसान गुलाम भारत में किसानों की हालत का हवाला देते हैं। वे कहते हैं कि हुकूमत सरमाएदारी के साथ है। शहीद भगत सिंह के नाम से किसानों ने मंच स्थापित कर लिया है और वे हर कुर्बानी देने की बात कह रहे हैं। उनका कहना है कि आने वाली पीढ़ियां बेज़मीनी हो जाएंगी। हमारी ज़मीन  सरमाएदार के हाथ में चली जाएगी। भारतीय जनतंत्र इस समय अनेक अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है। संसदीय प्रजातंत्र में संसद की प्रभुसत्ता सर्वमान्य है मगर संसद ठप्प है या कार्यपालिका के अधीनस्थ की भूमिका में आ गई है। सत्तारूढ़ दल के पास प्रचंड बहुमत और विपक्षी एकता के अभाव के चलते संसद की स्थिति कमज़ोर हो गई है। सत्तारूढ़ दल की रणनीति के तहत कार्यपालिका में भी प्रधानमंत्री का पद अत्यधिक शक्तिशाली स्थिति में आ गया है। लोकतंत्र का अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू जनमत तथा निश्चित अवधि में होने वाले चुनाव होते हैं। जनतंत्र के इस केंद्रीय स्तंभ को भी अनुकूलित करने की क्षमताएं सत्तारूढ़ पक्ष ने हासिल कर ली हैं। चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ करने, मीडिया का अनुकूलन करने, धन और लोक-लुभावने नारों के ज़बरदस्त इस्तेमाल के साथ 'जनतंत्र' को इस्तेमाल करने जैसी अधिनायकवादी प्रवृत्तियों से सत्ता-संचालन की प्रक्रिया उभरकर आई है। ऐसे अंतर्विरोधों के बीच फंसे जनतंत्र का सार और कमज़ोर तब हो जाता है जब राष्ट्रवाद के नाम पर जन अभिव्यक्ति को कुंद करने तथा आलोचना को राष्ट्रद्रोह बताने का डिज़ाइन भी एक हद तक कारगर हो रहा हो। इस विडंबनापूर्ण पृष्ठभूमि तथा संदर्भ में किसान आंदोलन का अवलोकन एक बड़ी जनतांत्रिक कार्यवाही के रूप में किया जाना चाहिए। वैसे भी अगर हम आज़ादी के आंदोलन के दौरान उभरे जन-आकांक्षाओं के सैलाब को इंगित करें तो यह साफ़ हो जाता है कि भारतीय समाज राष्ट्र-राज्य के निर्देशन में व्यापक जन भागीदारी से संचालित किए जाने के लक्ष्यों को निर्धारित करता है। आज़ादी के आंदोलन में भी करोड़ों लोगों ने नव-राष्ट्र-निर्माण की नींव रखने के कार्य में हिस्सा लिया था। इसीलिए संविधान में निचले स्तरों के जनतंत्र को भी बेहद महत्त्वपूर्ण बताया गया। जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय, इलाके तथा सांस्कृतिक विभिन्नता के देश में जनभागीदारी की व्यापकता ज़रूरी है, नहीं तो जनतंत्र सारहीन हो सकता है, जैसा कि हाल ही के वर्षों में हुआ भी है। इन हालात में चल रहा किसान आंदोलन जनतंत्र के पक्ष में एक ज़बरदस्त प्रतिक्रिया है। दिल्ली में बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए किसान भारतीय राष्ट्र-राज्य में 'नागरिकों की सक्रिय भूमिका' का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हैं। आंदोलन में भाग लेने वाले लाखों लोग एकजुट हैं। ये लोग एक साथ सोते हैं, खाना पकाते हैं, पंक्तियों में बैठ कर खाते हैं, एक दूसरे का ध्यान रखते हैं। यहां दिन-रात गीत गाए जाते हैं, नाटक होते हैं, भाषण दिए जाते हैं। हर उम्र के व्यक्ति (चाहे वह साक्षर है, अर्ध साक्षर है, शिक्षित है अथवा उच्च शिक्षित) को कानूनों के किसान-विरोधी होने की जानकारी है। हर व्यक्ति एकता बनाए रखने तथा कानून के तमाम पक्षों पर बहस करने के लिए सचेत और जागरूक है। हर आंदोलनकर्ता आत्मानुशासन, प्रतिबद्धता और संघर्ष का जज़्बा लिए 26 किसानों के शहीद हो जाने पर भी संयम और शांति बनाए रखने का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। 2017-18 में किसानों के मुंबई मार्च को जिस तरह आम लोगों की सहानुभूति, समर्थन और सहयोग मिला था, उससे भी कहीं अधिक समाज का हर वर्ग इस आंदोलन का सहयोग कर रहा है। यह सहयोग भावनात्मक तथा बौद्धिक स्तर पर तो कला, संस्कृति, मीडिया, शिक्षा, विज्ञान, लेखन तथा राजनीति से जुड़ी अनेक हस्तियों द्वारा अपनी उपाधियां और पुरस्कार आदि लौटा कर किया जा रहा है, वहीं भौतिक एवं व्यावहारिक स्तर पर यह सहयोग अनेक धार्मिक, सामाजिक, गैर सरकारी संस्थाओं एवं वर्गों के संगठनों तथा राजनीतिक दलों द्वारा भी किया जा रहा है। इसलिए बार-बार चलने वाली वार्ताओं के दौर विफल होने के बावजूद संघर्ष का जज़्बा बढ़ता ही जा रहा है लेकिन साथ ही उतनी ही गंभीरता और अनुशासन भी कायम है। सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करते हुए हर तरह की संकीर्ण पहचान को लांघता यह आंदोलन सही अर्थों में जनतंत्र की प्रक्रिया के प्रति समर्पित है और महिलाओं, युवा लोगों तथा प्रत्येक समुदाय की भागीदारी के फलस्वरूप सामाजिक-राजनीतिक जनतंत्र की मिसाल बन गया है।

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