मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

समापन समारोह 12.10.21 हमिटी, जींद।

 किसान संवाद खेत पाठशाला समापन समारोह 12.10.21 हमिटी, जींद।

                     कार्रवाई रिपोर्ट

डॉ सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता मिशन और कृषि विभाग द्वारा आयोजित किसान संवाद कार्यक्रम में मुख्य रूप से गुलाबी सुंडी बारे अनुभव साझा करना और अब तक के नियंत्रण करने के प्रयासों की प्रस्तुति करना था।

मुख्य अतिथि :- डॉक्टर आरपी सिहाग संयुक्त निदेशक कपास कृषि विभाग हरियाणा।

किसान संवाद:-

श्री रणवीर सिंह की कीटाचार्य, जींद ने अपनी 12वीं खेत पाठशाला के समापन समारोह पर बताया कि गुलाबी सुंडी का सबसे ज्यादा आक्रमण बीटी कपास पर हुआ है ।नॉन बीटी भी चपेट में आई है। हमारी समझ यह बनी है कि स्थानीय देसी कपास इसका विकल्प हो सकता है ।देसी कपास का बीज बचाया जाना जरूरी है। जैसे पौधों और कीटों का संबंध है उसी प्रकार बीज और बीमारियों का संबंध भी है।

श्री मनवीर सिंह कीट आचार्य ने बताया कि बीज की वैरायटी के साथ-साथ जमीन का और पौधों का भी संबंध है ।हमारी फसल उत्पादन की प्रणाली ने भी दिक्कतें पैदा की है ।स्थानीयता की खासियत पर ध्यान देना ही पड़ेगा

सुश्री सविता मलिक ललित खेड़ा ने कीट खेत पाठशाला का अनुभव साझा करते हुए बताया कि गुलाबी सुंडी फूलों पतियों और परागण के नर मादा भागों को भी खाती है। इस बार बिल्कुल साफ सुथरे टींडो में भी सुंडी पाई गई है। कोई निशान भी नहीं पाया गया ।इस सुंडी को शुरुआती दौर में कुछ मकड़ियों ने अपना शिकार जरूर बनाया है। स्प्रे से इसका कोई इलाज नहीं हो सकता ।अंडों से सुंडी बनने तक 24 से 48 घंटे का ही समय होता है ।उसके बाद सप्रे का छिड़काव टिंडे के अंदर कोई असर नहीं कर सकता। बीटी नरमा इसका पसंदीदा भोजन है ।चुनौती यह है उभर कर सामने आई है कि सुंडी का प्रकोप और ज्यादा बढ़ गया है।

श्री जयपाल पुनिया बयाना खेड़ा ने बताया कि बिना स्प्रे और उचित दूरी व घास वाले खेत में सुंडी की मार 40% तक ही नोट की गई है। बीजाई का समय और वैरायटी का संबंध भी नोट किया गया है। कई वर्षों से कॉटन स्टिक जमीन के अंदर ही मिला रहा हूं ।बयाना खेड़ा गांव के चारों तरफ का सर्वे हमारे पास है। बीटी फेल हो चुकी है ।इसका विकल्प देशी कपास ही समाधान है।

सुश्री मनीषा वशिष्ठ ने एक कविता के माध्यम से फसल बर्बादी की कहानी प्रस्तुत की।

नरेंद्र पूनिया ने 4 साल के जैविक खेती का अनुभव साझा किया लेकिन बहुत सारी कठिनाइयों को भी बताया।

श्री सूरजभान चंद्रावल फतेहाबाद ने बताया कि मैं 2016 से डॉ सुरेंद्र दलाल कीट पाठशाला से जुड़ा हूं। कीटों के साथ-साथ  बिजाई का समय का विशेष महत्व रखता है सुंडी का प्रकोप पछेती फसल में ज्यादा नोट किया गया है। इस बार हरा तेला , चुरडाऔर सफेद मक्खी का सतर नुकसान के स्तर से काफी कम ही रहा ।हमें  स्प्रे की जरूरत नहीं पड़ी। हमारी कपास 30- 35 मत तक हो सकती थी यदि सुंडी का प्रकोप ना होता तो। अब आठ से 10 मण कपास प्रति एकड़ निकलेगी।

धर्म सिंह सह संयोजक कीट साक्षरता मिशन खेत पाठशाला। कीट खेत पाठशाला गुलजार का अनुभव साझा करते हुए बताया कि बाहर से आया बीज सुंडी प्रकोप का एक कारण पाया गया है। इसके साथ ही सुंडी के जीवन चक्र की अनभिज्ञता ने नुकसान किया है जैसे फसल के बाद अवशेषों का प्रबंधन ना होने से गुलाबी सुंडी का प्यूपा  मार्च से लेकर जून तक जमीन के अंदर किसी भी परिस्थिति में जिंदा रह सकता है ।अनुकूल परिस्थिति मिलते ही सुंडी में तब्दील हो जाता है। सोर्स ऑफ इन्फेक्शन को समझना एक बड़ी राहत दे सकता है ।

पौधों की आत्मरक्षा शक्ति वर्धन भी करनी होगी।

बीज, जमीन, पानी , हवा और सूर्य की रोशनी की उपलब्धता के भी अंत सम्बन्धों को समझना होगा।

डॉ रणवीर सिंह मलिक ने बताया कि जैसे पशुधन में स्थानीय नस्लें कम बीमार होती हैं ।निरंतर उत्पादन देती हैं। उसी प्रकार कपास में भी शायद स्थानीय बीजों का प्रयोग ठीक रहेगा।

अन्य वक्ताओं ने जमीन के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान रखने की बात कही ।पौधा जितना मजबूत होगा बीमारियां उतनी कम आएंगी।

मुख्य वक्ता एवं विशेषज्ञ कपास कृषि विभाग हरियाणा, डॉ रामप्रताप सिहाग ने कहा कि एक ही वेराइटी पर निर्भरता नहीं बनानी चाहिए ।फसल की विभिन्न वैरायटी अपनाते हुए खेती करें। स्थानीय बीजों का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करें ।उनकी प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है। कम खर्चा होता है। पर्यावरण सुरक्षित रहता है।

दूसरा गुलाबी सुंडी से बचने के लिए अभी से सोचना शुरू कर दें ।किसानों के स्तर पर कॉटन स्टिक खेत में ही चुगाई के बाद तुरंत रोटावेटर से मिला दे ।कॉटन स्टीक रखनी पड़े तो खेत में ना रखें ।

विभाग के स्तर पर जिनींग मिलों को संपर्क किया जा रहा है। वह अपना कार्य मार्च तक निपटा लें। बिनोले और रुई का कचरा बाहर ना फेंके। क्योंकि उसके साथ प्यपा खेत में चला जाता है।

तीसरा देसी कपास की बिजाई ज्यादा से ज्यादा करें। पौधों में संतुलित खुराक का विशेष ध्यान रखें। फसल है तो कीट भी आएंगे। नुकसान कम हो सकता है । हमारा पर्यावरण भी ठीक रह सकता है। बीज बनाने में किसान पहलकदमियां लें । आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए बीच-बीच में अन्य आर्थिक लाभ वाली फसलों का प्रयोग भी करते रहना जरूरी है ।विविधता से खेती में रोजगार बच सकता है। आप सभी किसान बहन भाई वैज्ञानिक विधि से खेती पर ज्यादा ध्यान दें ।भय और भ्रम से दूर रहें। विभाग हर संभव सहयोग करेगा। सभी प्रतिभागियों को पुरस्कार में पुस्तिकाएं दी गई। डा सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता मिशन द्वारा वक्ताओं और मुख्य वक्ता को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। सहयोग का आश्वासन दिया गया।

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