राज्य स्तरीय एक दिवसीय कन्वेंशन : नए कृषि कानून और जन सरोकार।
सभ्य नागरिक समाज की बात करते हुए हम समझते हैं कि सक्रिय जनभागीदारी ,लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के साथ बढ़ते क्रम में उत्तरोत्तर विकास की क्रियाओं का घटित होना होता है। विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल प्रकृति के सह अस्तित्व के साथ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना सुनिश्चित करना है ।जीवन के हर पहलू को संज्ञान में लेते हुए व्यापक एकता की गरज से सभी वंचितों का संबोधन ज्ञान विज्ञान आंदोलन का मुख्य कार्य है। इसी क्रम में कृषि_ पशुधन क्षेत्र का संबोधन करने का प्रयास किया गया है। कोई छोटा _मोटा हस्तक्षेप करने की शुरुआत। सामाजिक_ आर्थिक संबंधों को और कानूनों के पक्षों को नई आर्थिक नीतियों के तहत विचार के लिए एक दिवसीय राज्य कन्वेंशन का आयोजन 20जनवरी 2021 को हिसार में किया गया।
इस पृष्ठभूमि में सर्वप्रथम यह जानने की जरूरत है कि यह नए कृषि कानून संवैधानिक रूप से सही प्रक्रियाओं को अपनाते हुए लाए गए या उल्लंघन हुआ है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत केंद्र और राज्य के अधिकारों का ख्याल रखा गया या नहीं । संबंधित क्षेत्र से जुड़े संगठनों /व्यक्तियों के संज्ञान में लाया गया या नहीं । व्यापक जनहित का ख्याल रखते हुए लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से नए कानून बनाए गए या नहीं। आत्मनिर्भरता, खाद्य सुरक्षा और गरिमामय जीवन जीने की गारंटी है या नहीं।
इन सभी जन_ सरोकारों के प्रश्नों पर विचार विमर्श और जन शिक्षण कार्य हेतु कन्वेंशन में निम्न विषयों पर स्रोत व्यक्तियों द्वारा संबोधित किया गया। १ नए कृषि कानून और समाज पर प्रभाव । २फसलों का विविधीकरण और जमीन की उर्वरा शक्ति का ह्रास ३ खाद्य सुरक्षा की गारंटी का सवाल। ४ पशुधन क्षेत्र (पशु पालन , मछली पालन और कुक्कट पालन क्षेत्रों का योगदान।
विषयों की रोशनी में सामाजिक ताने-बाने में और देश की अर्थव्यवस्था पर किस तरह के कुप्रभाव पढ़ने जा रहे हैं यानी खेती-बाड़ी और पशुधन क्षेत्र में रोजगार सृजन पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेंगे। अभी तक कृषि क्षेत्र और पशुपालन क्षेत्र देश की 60% आबादी को प्रत्यक्ष_ अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से प्रभावित करता है। इस 1वर्ष 1920 21 में करोना काल में भी दो तीन प्रतिशत सकारात्मक आर्थिक वृद्धि दर बनाए रखना इसके महत्व को बखूबी रेखांकित करता है। जबकि सेवा और औद्योगिक क्षेत्र में वृद्धि दर नकारात्मक 26% तक चली गई । दूसरे शब्दों में कहें तो रोजगार के अवसर विपरीत परिस्थितियों में भी कृषि और पशुधन व संबंधित क्षेत्रों में ही बने हुए हैं। अन्य क्षेत्रों में रोजगारहीनता पैदा करके गहरे संकट को न्योता दिया है । विषय विशेषज्ञों और अनुभवी स्रोत व्यक्तियों ने विषय वार अपनी अपनी प्रस्तुतियों में बयान किया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की घोर उपेक्षा हुई । कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ आ गया है। आत्मनिर्भरता के स्थान पर अति केंद्रीयकरण की मानसिकता के चलते निजी हितों को साधा गया। रोजगारहीन विकास का मॉडल प्रस्तुत किया जा रहा है । इन हालातों में सामाजिक शांति और समानता का तो सपना भी नहीं देखा जा सकता। संवेदनहीन निर्णयों के चलते भारी उथल-पुथल और भूखमरी का आलम बनता दिखाई दे रहा है । बहिष्कार की नीतियों के चलते जनपक्ष के मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं।इस समाज में एक व्यक्ति के होने को अस्वीकार करते हुए या उसके अस्तित्व को वस्तु की श्रेणी में रखकर उपयोगितावादी दृष्टि से देखा जा रहा है । ऐसे में सभ्य नागरिक समाज निर्माण प्रक्रिया में वैचारिक पक्ष को मजबूत करके आगे बढ़ा जा सकता है । ठोस हस्तक्षेप कारी भूमिका लेते हुए जन सरोकारों को स्थापित किया जा सकता है । व्यापक एकता का मूल आधार होगा अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के लिए सीमित संसाधनों के साथ संख्यात्मक और गुणात्मक बदलाव करने होंगे। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए संगठन द्वारा और नेटवर्किंग के तहत सक्रिय रूप से काम शुरू कर दिया गया है।
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