मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

किसान आंदोलन का सफल होना 

 क्योंक्यों किसान आंदोलन का सफल होना हम सबके लिए बेहद जरूरी है

हम बहुत बार किसी आंदोलन के बारे में अपनी राय उस आंदोलन के मुद्दों की पड़ताल के आधार पर नहीं बनाते बल्कि उसके हिमायतियों या विरोधियों की पहचान या आंदोलन के तौर तरीकों के आधार पर बनाते हैं ।आंदोलन की मांग ठीक है या गलत इसके लिए समय और ऊर्जा लगा कर जांच पड़ताल और अध्ययन करना पड़ता है। इसके उलट आंदोलन कौन कर रहा है, कैसे कर रहा है यह साफ दिखाई देता है  ।

अगर आंदोलनकारी हमारे अपने हैं हम जैसे ही हैं तो आमतौर पर हम आंदोलन का समर्थन करते हैं ।और अगर आंदोलनकारी हमारे विरोधी या हमसे अलग हैं तो आमतौर पर हम भले ही आंदोलन का विरोध ना करें कम से कम उसके प्रति उदासीन तो हो ही जाते हैं।

यह बात वर्तमान किसान आंदोलन पर भी लागू होती है। भावनाओं के असर में आकर किसान आंदोलन में रातों-रात शामिल होने वाले कई लोगों को शायद नए कृषि कानूनों की पूरी जानकारी ही न हो । इसी तरह जो किसान नहीं है । जिनका किसानों से कोई पारिवारिक या व्यक्तिगत नाता नहीं है । वह स्वाभाविक तौर पर न केवल इस आंदोलन के प्रति उदासीन रह सकते हैं बल्कि इसे शंका की निगाह से भी देख सकते हैं परंपरागत जातिगत विद्वेष के चलते किसानी से जुड़े कुछ समुदाय भी ऐसा रुख अपना सकते हैं ।इस आंदोलन में कुछ समुदायों की अग्रणी भूमिका की वजह से कई तबकों को किसान आंदोलन की ताकत और इस कानून का विरोध केवल कुछ तबके ही कर रहे हैं।


इन कानूनों की व्याख्या अगर एक वाक्य में की जाए तो सरकार के अपने ही शब्दों में 90 के दशक से शुरू हुआ उदारीकरण कृषि क्षेत्र में अब हो रहा है।  कृषि कानूनों के पक्ष में निकाली गई 106 पन्नों की सरकारी पुस्तिका का पृष्ठ ६ यानि कृषि एक बड़ी कंपनी 'अब आपकी अपनी दुकान हो गई है।

पर इसके चलते क्या रोजगार बढे हैं। अगर ठीक-ठाक रोजगार के पर्याप्त अवसर प्राप्त होते तो कम से कम बीगे 2 बीघे का किसान तो  कब का खेती छोड़ चुका होता। आज तो वही छोटा किसान खेती कर रहा है जिसके पास और कोई विकल्प नहीं है । अब जब कंपनियां खुद खेती करने लग जाएंगे । जिसका रास्ता करार खेती कानून के तहत खुल गया है तो कृषि क्षेत्र में रोजगार बहुत कम हो जाएंगे । कंपनियां तो छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर बड़े-बड़े खेत बनाएंगी जहां मजदूर का कम और मशीनरी का ज्यादा इस्तेमाल होगा । अगर कृषि क्षेत्र में रोजगार बहुत कम हो जाएगा तो सब तरह का काम धंधा मंदा हो जाएगा । एक खराब मानसून से किसान की आमदनी घटने से दुकानदारी खत्म हो जाती है ऐसे में कल्पना करें कि जब खेती में रोजगार हमेशा के लिए कम हो जाएगा तो शेष अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा । बेरोजगार हुआ यह किसान जाएगा कहां है। यह तो शहरों में बेरोजगारी की लाइन को और लंबा कर देगा या छोटी मोटी दुकानदारी करेगा।

इसके अलावा अगर कृषि का कंपनीकरण हो गया और देश की आधी आबादी को अपने ठिकाने से खदेड़ दिया गया तो अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी आ रही निजी करण की आंधी और तेज हो जाएगी। पहले से ही सरकार इस ओर तेजी से बढ़ रही है फिर चाहे वह रेलवे हो , सड़क परिवहन हो या बैंक । छोटा दुकानदार छोटा कारीगर तो तेजी से खत्म हो रहा है अब अगर यही हाल छोटे किसान का हुआ और सरकार ने अपना पल्ला किसान से झाड़ लिया तो अर्थव्यवस्था का कोई क्षेत्र कोई मजदूर अरबों काम आए हैं नया बजट भी इस राह पर ही है

जैसे स्कूलों के निजीकरण के चलते बच्चों पर ट्यूशन और कोचिंग का बोझ और मां-बाप पर खर्च का बोझ बढ़ा है यही आलम भोजन खर्च का होगा आवश्यक वस्तु कानून के तहत सरकार कीमतों और कालाबाजारी पर रोक लगाने के उपाय कर सकती है पर अब इस कानून की पकड़ ढीली कर दी गई है अब अनाज दालें तेल नारियल आलू और प्याज पर यह कानून आमतौर पर लागू नहीं होगा सोचिए अगर जीने के लिए भोजन भी आवश्यक नहीं है तो आवश्यक वस्तु और क्या है जब यह कानून गिने-चुने हालात में लागू हो भी होगा तब भी खाद्य उपयोग या निर्यात आदि में लगी कंपनियों पर लागू नहीं होगा यानी अब कंपनियों द्वारा जमाखोरी पर कोई पाबंदी नहीं होगी किसानों को इसका फायदा नहीं होगा क्योंकि किसान तो फसल को सीधे खेत से मंडी ले जाता है इसका फायदा तो बड़ी कंपनियों को ही होगा नुकसान आम आदमी छोटे किसान दुकानदार और व्यापारी को होगा महंगाई बढ़ेगी इसके अलावा कंपनियां खेती करेंगे तो वह केवल मुनाफा देखेंगे देश की अन्य सुरक्षा नहीं अमेरिका जैसे देश तो कब से कह रहे हैं कि भारत को फूलों की खेती करनी चाहिए अनाज तो हम दे देंगे पर क्या किसी देश का अंग जैसी जरूर चीज के लिए विदेशों पर निर्भर रहना ठीक है केवल वह लोग इनके सी कानूनों का समर्थन कर सकते हैं जो मानते हैं कि सब कुछ कंपनियों के भरोसे छोड़ ना ही चाहिए लेकिन थोड़ा भी विचारशील व्यक्ति इस बात को समझेगा कि सबकुछ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता बाजार अर्थव्यवस्था पर सरकार समाज का नियंत्रण रहना ही चाहिए कुछ लोगों को लग सकता है कि सरकार ने किसानों की बहुत सी बातें मान ली हैं और अब किसान फालतू की जिद कर रहे हैं असल में तो सरकार जिन संशोधनों पर तैयार हुई है वह मुद्दे छोटे हैं जैसे किसान को आधार में जाने का अधिकार व्यापारियों का पंजीकरण इत्यादि बुनियादी नीति में सरकार ने अब तक कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं किया है इस तरह भले ही ऊपरी तौर पर उच्चतम न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी है मगर आदेश के अगले ही पैरा 14 दोसे मना किया हो और अब अदालत ने दे दिया हो

जब शांतिपूर्ण प्रतिरोध की अनदेखी होती है तो हिंसक आंदोलन को बढ़ावा मिलता है इसलिए नए कृषि कानूनों का विरोध हम सब को करना चाहिए अभी तक सरकार इससे कुछ तबकों का आंदोलन मानकर इन कानूनों को वापस नहीं ले रही अगर हम सब अपना विरोध जो निहायत जरूरी भी है दर्ज कराएं तो सरकार की आंख खुल जाएगी और वह देश को कंपनियों के पास बंधक रखने के अपने कदम वापस खींच लेगी और अगर हम ऐसा नहीं करते तो देश चंद चरणों का गुलाम हो जाएगा किसान आंदोलन का सफल होना हम सबके लिए बेहद जरूरी है

हम बहुत बार किसी आंदोलन के बारे में अपनी राय उस आंदोलन के मुद्दों की पड़ताल के आधार पर नहीं बनाते बल्कि उसके हिमायतियों या विरोधियों की पहचान या आंदोलन के तौर तरीकों के आधार पर बनाते हैं ।आंदोलन की मांग ठीक है या गलत इसके लिए समय और ऊर्जा लगा कर जांच पड़ताल और अध्ययन करना पड़ता है। इसके उलट आंदोलन कौन कर रहा है, कैसे कर रहा है यह साफ दिखाई देता है  ।

अगर आंदोलनकारी हमारे अपने हैं हम जैसे ही हैं तो आमतौर पर हम आंदोलन का समर्थन करते हैं ।और अगर आंदोलनकारी हमारे विरोधी या हमसे अलग हैं तो आमतौर पर हम भले ही आंदोलन का विरोध ना करें कम से कम उसके प्रति उदासीन तो हो ही जाते हैं।

यह बात वर्तमान किसान आंदोलन पर भी लागू होती है। भावनाओं के असर में आकर किसान आंदोलन में रातों-रात शामिल होने वाले कई लोगों को शायद नए कृषि कानूनों की पूरी जानकारी ही न हो । इसी तरह जो किसान नहीं है । जिनका किसानों से कोई पारिवारिक या व्यक्तिगत नाता नहीं है । वह स्वाभाविक तौर पर न केवल इस आंदोलन के प्रति उदासीन रह सकते हैं बल्कि इसे शंका की निगाह से भी देख सकते हैं परंपरागत जातिगत विद्वेष के चलते किसानी से जुड़े कुछ समुदाय भी ऐसा रुख अपना सकते हैं ।इस आंदोलन में कुछ समुदायों की अग्रणी भूमिका की वजह से कई तबकों को किसान आंदोलन की ताकत और इस कानून का विरोध केवल कुछ तबके ही कर रहे हैं।


इन कानूनों की व्याख्या अगर एक वाक्य में की जाए तो सरकार के अपने ही शब्दों में 90 के दशक से शुरू हुआ उदारीकरण कृषि क्षेत्र में अब हो रहा है।  कृषि कानूनों के पक्ष में निकाली गई 106 पन्नों की सरकारी पुस्तिका का पृष्ठ ६ यानि कृषि एक बड़ी कंपनी 'अब आपकी अपनी दुकान हो गई है।

पर इसके चलते क्या रोजगार बढे हैं। अगर ठीक-ठाक रोजगार के पर्याप्त अवसर प्राप्त होते तो कम से कम बीगे 2 बीघे का किसान तो  कब का खेती छोड़ चुका होता। आज तो वही छोटा किसान खेती कर रहा है जिसके पास और कोई विकल्प नहीं है । अब जब कंपनियां खुद खेती करने लग जाएंगे । जिसका रास्ता करार खेती कानून के तहत खुल गया है तो कृषि क्षेत्र में रोजगार बहुत कम हो जाएंगे । कंपनियां तो छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर बड़े-बड़े खेत बनाएंगी जहां मजदूर का कम और मशीनरी का ज्यादा इस्तेमाल होगा । अगर कृषि क्षेत्र में रोजगार बहुत कम हो जाएगा तो सब तरह का काम धंधा मंदा हो जाएगा । एक खराब मानसून से किसान की आमदनी घटने से दुकानदारी खत्म हो जाती है ऐसे में कल्पना करें कि जब खेती में रोजगार हमेशा के लिए कम हो जाएगा तो शेष अर्थव्यवस्था का क्या हाल होगा । बेरोजगार हुआ यह किसान जाएगा कहां है। यह तो शहरों में बेरोजगारी की लाइन को और लंबा कर देगा या छोटी मोटी दुकानदारी करेगा।

इसके अलावा अगर कृषि का कंपनीकरण हो गया और देश की आधी आबादी को अपने ठिकाने से खदेड़ दिया गया तो अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी आ रही निजी करण की आंधी और तेज हो जाएगी। पहले से ही सरकार इस ओर तेजी से बढ़ रही है फिर चाहे वह रेलवे हो , सड़क परिवहन हो या बैंक । छोटा दुकानदार छोटा कारीगर तो तेजी से खत्म हो रहा है अब अगर यही हाल छोटे किसान का हुआ और सरकार ने अपना पल्ला किसान से झाड़ लिया तो अर्थव्यवस्था का कोई क्षेत्र कोई मजदूर अरबों काम आए हैं नया बजट भी इस राह पर ही है

जैसे स्कूलों के निजीकरण के चलते बच्चों पर ट्यूशन और कोचिंग का बोझ और मां-बाप पर खर्च का बोझ बढ़ा है यही आलम भोजन खर्च का होगा आवश्यक वस्तु कानून के तहत सरकार कीमतों और कालाबाजारी पर रोक लगाने के उपाय कर सकती है पर अब इस कानून की पकड़ ढीली कर दी गई है अब अनाज दालें तेल नारियल आलू और प्याज पर यह कानून आमतौर पर लागू नहीं होगा सोचिए अगर जीने के लिए भोजन भी आवश्यक नहीं है तो आवश्यक वस्तु और क्या है जब यह कानून गिने-चुने हालात में लागू हो भी होगा तब भी खाद्य उपयोग या निर्यात आदि में लगी कंपनियों पर लागू नहीं होगा यानी अब कंपनियों द्वारा जमाखोरी पर कोई पाबंदी नहीं होगी किसानों को इसका फायदा नहीं होगा क्योंकि किसान तो फसल को सीधे खेत से मंडी ले जाता है इसका फायदा तो बड़ी कंपनियों को ही होगा नुकसान आम आदमी छोटे किसान दुकानदार और व्यापारी को होगा महंगाई बढ़ेगी इसके अलावा कंपनियां खेती करेंगे तो वह केवल मुनाफा देखेंगे देश की अन्य सुरक्षा नहीं अमेरिका जैसे देश तो कब से कह रहे हैं कि भारत को फूलों की खेती करनी चाहिए अनाज तो हम दे देंगे पर क्या किसी देश का अंग जैसी जरूर चीज के लिए विदेशों पर निर्भर रहना ठीक है केवल वह लोग इनके सी कानूनों का समर्थन कर सकते हैं जो मानते हैं कि सब कुछ कंपनियों के भरोसे छोड़ ना ही चाहिए लेकिन थोड़ा भी विचारशील व्यक्ति इस बात को समझेगा कि सबकुछ बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता बाजार अर्थव्यवस्था पर सरकार समाज का नियंत्रण रहना ही चाहिए कुछ लोगों को लग सकता है कि सरकार ने किसानों की बहुत सी बातें मान ली हैं और अब किसान फालतू की जिद कर रहे हैं असल में तो सरकार जिन संशोधनों पर तैयार हुई है वह मुद्दे छोटे हैं जैसे किसान को आधार में जाने का अधिकार व्यापारियों का पंजीकरण इत्यादि बुनियादी नीति में सरकार ने अब तक कोई परिवर्तन स्वीकार नहीं किया है इस तरह भले ही ऊपरी तौर पर उच्चतम न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी है मगर आदेश के अगले ही पैरा 14 दोसे मना किया हो और अब अदालत ने दे दिया हो

जब शांतिपूर्ण प्रतिरोध की अनदेखी होती है तो हिंसक आंदोलन को बढ़ावा मिलता है इसलिए नए कृषि कानूनों का विरोध हम सब को करना चाहिए अभी तक सरकार इससे कुछ तबकों का आंदोलन मानकर इन कानूनों को वापस नहीं ले रही अगर हम सब अपना विरोध जो निहायत जरूरी भी है दर्ज कराएं तो सरकार की आंख खुल जाएगी और वह देश को कंपनियों के पास बंधक रखने के अपने कदम वापस खींच लेगी और अगर हम ऐसा नहीं करते तो देश चंद चरणों का गुलाम हो जाएगा

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