मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

किसानों की ऐतिहासिक जीत के हरियाणा की कृषि और समाज पर प्रभाव।

 विषय:  किसानों की ऐतिहासिक जीत के हरियाणा की कृषि और समाज पर प्रभाव।

मुख्य वक्ता    :-प्रोफेसर टी आर कुंडू, पूर्व डीन एकेडमिक व

On Thu, 17 Mar, 2022, 7:51 pm Baljit singh bhyan, <bhyanbs2017@gmail.com> wrote:

टिकाऊ खेती, टिकाऊ खेती और वैज्ञानिक खेती।

    डॉ सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता मिशन एवं हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा आयोजित किसान खेत पाठशाला आयोजन, दिनांक14फरवरी22 को  ऑनलाइन।

 प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ,कुरुक्षेत्र।

हाजिरी  :-      40 के लगभग किसान और कार्यकर्ता।

अध्यक्षता       :- डॉ रणवीर सिंह दहिया अध्यक्ष हरियाणा ज्ञान                                              

                       विज्ञान समिति हरियाणा।             

संचालन           :-डॉक्टर बलजीत सिंह भ्याण।

संयोजन           :- धर्मसिंह।

                     परिचय के  बाद प्रोफेसर डीआर कुंडू ने कहा कि किसानी को विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति माना जाता है।खेती किसानों की जीवन शैली और जीवन रेखा है। खेती करने की प्रक्रिया और परिस्थितिवश सामूहिकता इस का आधार माना जाता है। वर्णवादी और बाजारवादी व्यवस्था  ने किसानों की सामाजिक -सांस्कृतिक जीवन शैली को तहस-नहस करके रख दिया है। तीन कृषि कानूनों के लागू होने से किसानों और मजदूरों में यह एहसास चला गया कि अब सब कुछ छीनने वाला है,जो सच था।

           तीन कृषि कानूनों को रद्द करवाने के लिए किसानों ने विवेक शीलता का परिचय देते हुए सही संदर्भों में इसके महत्व को समझा और समझाया । मास एजुकेशन की कार्य नीति अपनाई । जनसमर्थन जुटाने की वैचारिक और सांगठनिक कार्रवाई शुरू की। यानी तोड़ने का विकल्प जोड़ना शुरु किया।

सामाजिक ,सांस्कृतिक ,आर्थिक ,प्रशासनिक, राजनीतिक, संवैधानिक और न्यायिक क्षेत्रों की भूमिका को समझने समझाने और उनके साथ व्यवहार करने के तौर-तरीकों को बखूबी आत्मसात किया गया इस आंदोलन में।

किसानों के समूहों के बीच और किसानों- मजदूरों के बीच व्यापक एकता का निर्माण करते हुए महिलाओं और युवा लड़के लड़कियों के अंदर आशा के बीज बोए और उनकी सकारात्मक सक्रिय भूमिका के लिए मंच प्रदान किया गया।

आंदोलन में भोजन की आवश्यकता की पूर्ति करना महत्वपूर्ण काम होता है । चुंकि किसान अनाज व दूध खुद पैदा करते है और 6 माह का भंडार भी रख लेते है । इस वजह से लंबा संघर्ष चलाने की ताकत को पहचान लिया  गया ।अपने तजुर्बे से भी वह  यह जानता है कि संकट के दिनों में कैसे काम चलाया जाता है। कैसे आपातकालीन समय में प्रबंधन किया जाता है ।सहयोग की भावनाओं की पहचान भी पुनः की गई इस दौरान।

* इस प्रकार सामाजिक तौर पर सामूहिकता का पुनर्निर्माण, किसान आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रभाव है। सामूहिक भोज और लंगर परंपरा का विकास हुआ है । सिख समुदाय से ना केवल हरियाणा वासियों ने सीखा बल्कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय ने भी बढ़-चढ़कर इस रिवायत में हिस्सेदारी की। राम- राम ,सलाम और सत श्री काल के संबोधन से गहरा संवाद भी विकसित हुआ। अनेक कलाकारों ने गीत, भजन ,कविता, नाटक आदि की रचना और गायन व प्रस्तुतियां दी। वीडियो ऑडियो का निर्माण भी किया गया।

* राजनीतिक शून्यता और निराशा भाव को तोड़ने के लिए गणतंत्र की असल पहचान की और  इसको बखूबी स्थापित भी किया गया। राजनीतिक हमलों और षड्यंत्रों का लोकतांत्रिक तरीके से मूहतोड़ जवाब दिया ।सत्ता पक्ष को हमेशा बैकफुट पर रखा। विपक्ष को मुंह खोलने का अवसर दिया। स्वतंत्र पत्रकारिता के मुद्दे पर गहरी नजर रखी गई । गोदी मीडिया का विकल्प सोशल मीडिया को बनाया गया। बातचीत के लिए जन दबाव इतना बनाया की सरकार की चूल्हे हिल गई।

* प्रशासनिक कार्रवायों  का कड़ा मुकाबला निडरता और सहजता से किया गया। बहुत बार अधिकारियों ने माफी भी मांगी। सुनियोजित तरीकों से प्रशासन से निपटने के तौर-तरीकों को सीखा और व्यवहार में अमल भी किया।

*आर्थिक मसलों पर स्पष्टता के कारण यह अहसास पैदा किया कि प्राकृतिक संसाधनों की पैदावार और टैक्स का पैसा आम जनता का ही होता है । अतः इसका इस्तेमाल सार्वजनिक तौर पर किया जाना चाहिए। आर्थिक मसले सामाजिक और राजनीतिक ही होते हैं । यह बड़ा सवाल है।इनके अंत: संबंधों को जाना भी और बताया भी।  इसलिए शुरू से ही कारपोरेट पर सीधी और राजनीतिक प्लेटफार्म पर गहरी चोट की।

*न्याय प्राप्त करने की इच्छा और राह ने  न्यायपालिका को भी सोचने पर मजबूर किया । अपनी कानूनी जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों के लिए किसान आंदोलन ने यह बताया कि हम सब का सम्मान करते हैं और अपने हक के लिए लड़ते भी हैं । गणतंत्र की अवधारणा को स्थापित बहुत अच्छे से किया गया।

पत्रकारिता की वैकल्पिक भूमिका का सदुपयोग करना भी किसानों ने इस दौरान सीख लिया। जनपक्षीय पत्रकारिता को संरक्षित किया ।उसको मंच प्रदान किया । पिछलग्गू और गोदी मीडिया को उसकी औकात बता दी। साल भर तक कृषि संकट का मुद्दा बनाए रखा। अच्छे और बुरे की पहचान इस दौरान की गई है।

राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत किया गया। वर्गीय हितों की पहचान को विस्तार दिया । इस आंदोलन में महिला भी किसान हैं, यह स्वीकृति मिली । युवाओं का रचनात्मकता में महत्वपूर्ण योगदान होता है। जात-  पात और धार्मिक संकीर्णताओं और बंधनों को ढीला किया गया।  कुछ हद तक तोड़ने में भी कामयाब हुए हैं।  महापंचायतों के माध्यम से खाप पंचायतों की रचनात्मक सामूहिक भूमिका के लिए माहौल बनाया गया । सामंतवादी संकीर्ण सोच को बदलनने की प्रक्रियाओं की शुरुआत,  बड़ा घटनाक्रम इस आंदोलन में हुआ है। इसीलिए उदारवादी भाव पैदा होना शुरू हुआ इस आंदोलन में।

निष्कर्ष : श्रमजीवी और परजीवी तबके की पहचान को रेखांकित किया गया।

विकल्पहीता को तोड़ना और वैकल्पिक परिस्थितियों  को पैदा करना। सामाजिक, संस्कृतिक,आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों को शामिल किया गया।अंत:सम्बन्धों के महत्वों को  पहचाना गया।

*जनपक्षीय और जनविरोधी हथियारों और विचारों की पहचान भी इस दौरान की गई। इनमें मुख्य हथियार और विचार शांति पूर्वक निरंतर और सचेत संघर्षों का विकास रहा। बहुत कुछ संभव है यह अवधारणा बलवती हुई।

संगठन की समझ और वर्तमान सत्ता की तासीर को समझ कर आंदोलन को स्थगित किया गया ना कि खत्म किया ,यह दर्शाता है कि किसानों की मन:स्थिति क्या है? रणनीति और कार्य नीति का संयोजन  परिवर्तन की ओर ले जाता हुआ प्रतीत होता है। किसान , कृषि संकट और कारपोरेट्स, इस जंगचर पर संघर्ष बाकी है।कृषि संकट हल होना बाकी है।

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