व्यवस्था का अमानवीयकरण
मनमोहन
टाज अगर अपने चारों और देखना शुरु करें तो लगेगा कि हम चापलूसों ईर्ष्यालुओं,स्वार्थियों,हत्यारों, कायरों, कुंठितों,कुत्सितों,पराजितों और शरीर और मन के गुलामों या भ्रष्ट व्यवसायियों के बीच फंसे हुए ऐसे ही कोई आदमीनुमा जन्तु हें। सरा देश एक जुगल का खूबसूरत दृश्य पेश उपस्थित कर रहा है, जहां लोग झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को खा रहे हैंए भाग रहे हैं, रो रहे हैं, नाच और गा रहे हैं,भूखे मर रहे हैं, तबाह हो रहे हैं, तबाह कर रहे हैं, जिससे जो बन पड़ रहा है, वह कर रहा है। एक मुक्त युद्ध शुरु हो गया है, हर आदमी की निगाहों में एक क्रूर स्वार्थी चमक है। किसी कि आंखों में भीख है, याचना है, गिड़गिड़ाहट है, किसी कि आंखों में तिरिस्कार है, उपेक्षा है, एक शातिर परायापन है, एक चालाक ‘बिजनिस मैन शिप ’ है। रिश्ते रश्म अदायगी हो चुके हैं। ‘ क्या हाल चाल है?’ पूछने वाले का अपना हाल चाल पूछने और जानने का कोर्ठ मन्तव्य नहीं होता। दीपावली पर शुभ कामना कार्ड भेजने वाले के दिल में अक्सर कोई शुभ भावना आपके लिए नहीं होती। लोग होली पर भी मिलते हैं पर ऐसे जैसे दो लाशों को जर्बदस्ती गले मिलाया जा रहा हो।दो घर जिनकी छतें मिली हुई हैं एक दूसरे से सबसे अधिक डाह करते हैं। दो खेत जिसकी एक ही मेंड है एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।दो कलर्क जो एक ही कतार में दिन भर बराबर बैठ कर काम करते हैं - एक दूसरे के दुश्मन हैं।एक का प्रोमोशन दूसरे का दुख होगा। हर व्यकित, हर दूसरे के बारे में हर तीसरे से कानाफूसी करता हुआ मिलेगा। सब धोखा धड़ी से नजरें बचाकर अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त हैं। लोग दूसरों को धोखा दे रहे हैं, अपने आप को धोखा दे रहे हैं, दुहरी जिन्दगी जी रहे हैं, अपने आप से भाग रहे हैं, अपनी निजता खो रहे हैं,अपने आत्म सममान को चूर चूर होता हुआ दैख रहे हैं। खुलम खुल्ला दिन की रोशनी में अन्याय और अत्याचार हो रहा है और देखने वाले बचकर गुजर रहे हैं, यहां जतक कि उसमें रस ले रहे हैं, दया भी कर रहे हैं, बस इतनी जितनी टीका टिप्पणी के लिए जरुरी है।हम लोग आये दिन रोंगटे खड़े हो जाने वाली खबरें पढ़ रहे हैं। देख रहे हैं।अध्यापक के सीने पर चाकू विद्यार्थी रखता है, विद्यार्थी से आर्थिक व्यवसाय अध्यापक करता है। कालेज हॉस्टल में, कोतवाली में ब्लात्कार होते हैं, पुलिस के संरक्षण में हत्या होती है, भाग्य विधाता और कानून निर्माता तस्करी औरघोटाले करते हैं। बाप बेटी का गला घोंट रहा है क्योंकि उसके पास उसकी शादी के लिए दहेज नहीं, बेटा बाप के लिए सोच रहा है कि इसका बुढ़ापे का पीरियड कब खत्म हो जिससे उसका बजट थोड़ा ढीला हो सके, पति पत्नीको पीट रहा है, पत्नी पति को कोस रही है। आप कुछ सिक्कों में किसी का कत्ल कर सकते हैं, आप किसी की इज्जत उतार सकते हैं।
यह सब क्या हो गया है?
यह सब क्या हो रहा है?
इस सब का कारण क्या है?
मनमोहन
टाज अगर अपने चारों और देखना शुरु करें तो लगेगा कि हम चापलूसों ईर्ष्यालुओं,स्वार्थियों,हत्यारों, कायरों, कुंठितों,कुत्सितों,पराजितों और शरीर और मन के गुलामों या भ्रष्ट व्यवसायियों के बीच फंसे हुए ऐसे ही कोई आदमीनुमा जन्तु हें। सरा देश एक जुगल का खूबसूरत दृश्य पेश उपस्थित कर रहा है, जहां लोग झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को खा रहे हैंए भाग रहे हैं, रो रहे हैं, नाच और गा रहे हैं,भूखे मर रहे हैं, तबाह हो रहे हैं, तबाह कर रहे हैं, जिससे जो बन पड़ रहा है, वह कर रहा है। एक मुक्त युद्ध शुरु हो गया है, हर आदमी की निगाहों में एक क्रूर स्वार्थी चमक है। किसी कि आंखों में भीख है, याचना है, गिड़गिड़ाहट है, किसी कि आंखों में तिरिस्कार है, उपेक्षा है, एक शातिर परायापन है, एक चालाक ‘बिजनिस मैन शिप ’ है। रिश्ते रश्म अदायगी हो चुके हैं। ‘ क्या हाल चाल है?’ पूछने वाले का अपना हाल चाल पूछने और जानने का कोर्ठ मन्तव्य नहीं होता। दीपावली पर शुभ कामना कार्ड भेजने वाले के दिल में अक्सर कोई शुभ भावना आपके लिए नहीं होती। लोग होली पर भी मिलते हैं पर ऐसे जैसे दो लाशों को जर्बदस्ती गले मिलाया जा रहा हो।दो घर जिनकी छतें मिली हुई हैं एक दूसरे से सबसे अधिक डाह करते हैं। दो खेत जिसकी एक ही मेंड है एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।दो कलर्क जो एक ही कतार में दिन भर बराबर बैठ कर काम करते हैं - एक दूसरे के दुश्मन हैं।एक का प्रोमोशन दूसरे का दुख होगा। हर व्यकित, हर दूसरे के बारे में हर तीसरे से कानाफूसी करता हुआ मिलेगा। सब धोखा धड़ी से नजरें बचाकर अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त हैं। लोग दूसरों को धोखा दे रहे हैं, अपने आप को धोखा दे रहे हैं, दुहरी जिन्दगी जी रहे हैं, अपने आप से भाग रहे हैं, अपनी निजता खो रहे हैं,अपने आत्म सममान को चूर चूर होता हुआ दैख रहे हैं। खुलम खुल्ला दिन की रोशनी में अन्याय और अत्याचार हो रहा है और देखने वाले बचकर गुजर रहे हैं, यहां जतक कि उसमें रस ले रहे हैं, दया भी कर रहे हैं, बस इतनी जितनी टीका टिप्पणी के लिए जरुरी है।हम लोग आये दिन रोंगटे खड़े हो जाने वाली खबरें पढ़ रहे हैं। देख रहे हैं।अध्यापक के सीने पर चाकू विद्यार्थी रखता है, विद्यार्थी से आर्थिक व्यवसाय अध्यापक करता है। कालेज हॉस्टल में, कोतवाली में ब्लात्कार होते हैं, पुलिस के संरक्षण में हत्या होती है, भाग्य विधाता और कानून निर्माता तस्करी औरघोटाले करते हैं। बाप बेटी का गला घोंट रहा है क्योंकि उसके पास उसकी शादी के लिए दहेज नहीं, बेटा बाप के लिए सोच रहा है कि इसका बुढ़ापे का पीरियड कब खत्म हो जिससे उसका बजट थोड़ा ढीला हो सके, पति पत्नीको पीट रहा है, पत्नी पति को कोस रही है। आप कुछ सिक्कों में किसी का कत्ल कर सकते हैं, आप किसी की इज्जत उतार सकते हैं।
यह सब क्या हो गया है?
यह सब क्या हो रहा है?
इस सब का कारण क्या है?
क्या यह सब आकस्मिक है ? क्या यह सब दैवीय प्रकोप है ? क्या यह गोस्वामी तुलसीदास जी की भविष्यवाणी मात्र है -- कि कलयुग आ गया है ,जिसका कोई परिहार नहीं,कोई हल नहीं ,कोई इलाज नहीं | या फिर क्या यह अपनी पिछली संस्कृति को भूल जाने पश्चिम की होड़ करने का कुफल है ? क्या यह सब इसलिए है कि सब स्वार्थी और भ्रष्ट हो गए हैं | या यह सब इसलिए है कि कोई कर्तव्य नहीं करना चाहता और अधिकार पहले मांगता है |?
जो लोग मनुष्य की निसर्गत स्वार्थी मानते हैं , वे वस्तुत : या तो नासमझ होते हैं या फिर चालाक | मनुष्य प्रकृति की सबसे अधिक सँवेदनशील कृति है | मनुष्य सम्मान कर सकता है , प्यार कर सकता है ,सहयोग क्र सकता है ,और बलिदान कर सकता है | इन सारे गुणों का जन्म , इनका विकास और इनकी सुरक्षा वह केवल तब है जब की ऐसा करने के लिए उसका परिवेश उसे प्रेरित और बाध्य करे | उसकी जीवन पद्धति से सारे मानवीय मूल्यों का संबंध अंतर्विरोध से युक्त न हो | उसके चारों और की हवाएं ,उसके वातावरण के इर्द गिर्द उसके लिए ऐसा माहौल पैदा करें जिसमें उसे अधिक मानवीय और अधिक उत्तरदायी होने के लिए स्फुरण मिले | प्यार , सहयोग, कर्त्तव्य और सामाजिकता का बोध ये सब एस्प्रो की गोलियां नहीं जिन्हें निगलते ही व्यक्ति प्यार, सहयोग, कर्त्तव्य करना शुरू करदे | ये ऐसे गुण हैं जो व्यक्ति के अभ्यांतर से , पैदा होते हैं | जो उसकी इच्छा और उसके संस्कार होते हैं , इन्हें थोंपा या चिपकाया नहीं जा सकता | इन गुणों का जन्म सायास नहीं कर सकता | कोई इसलिए प्यार नहीं कर सकता कि उसे प्यार करना है | कोई इसलिए किसी का सम्मान नहीं क्र सकता कि उसे सम्मान करना चाहिए | बल्कि वह इसलिए ऐसा करता है क्योंकि वह ऐसा करने के ;लिए अंदर से विवश होता है | अंदरूनी मनोभाव अनायास स्वतस्फूर्त होते हैं | अगर ऐसा नहीं होता तो वहां नाटक होता है | सो , इस व्यापक अमानवीकरण का कारण यह नहीं होता कि हमने अच्छी अच्छी बातें बताने में और उपदेश पम्प करने में कोई कोताही की है | 'चाहिए ' वाली भाषा में बात करने वाले लोग हमेशा यथार्थ से दूर होते हैं और इसलिए हमेशा यथार्थ का अवैज्ञानिक विश्लेषण और हल देते हैं| वे व्यक्ति मन की प्रकृति का अध्ययन नहीं करते और इसलिए अपनी तमाम सदिच्छा के बावजूद वे कोई भी तर्कसंगत , ठोस और व्यावहारिक तथा कारगर हल नहीं देते | वे यथार्थ के चरित्र को न समझकर उसे आदर्श में बदलने की जल्दबाजी में तो रहते हैं , परन्तु बदलाव की कोई असली योजना उनके पास नहीं होती | इसकी एकमात्र बात यह है कि वे कार्य और कारण की सही सही पहचान करने में चूक जाते हैं |
भारत के कोने में फैला हुआ यह घोर नर्क कोई आकस्मिक प्रकोप नहीं ! इसकी उत्पत्ति के अपने ठोस कारण हैं , इसके उद्गम के अपने स्रोत हैं जिन्हें सदियों से छुआ नहीं गया ! जड़ को न पकड़ कर पत्तियों को पीटते रहे तो हम अपनी समस्या के साथ मूर्खतापूर्ण ढंग से निपटना चाहते हैं !
ऑफदमी के जानवर हो जाने का सीधा संबंध प्रत्यक्षत: इस अमानवीय समाज व्यवस्था से और परोक्ष रूप से और मुख्यत: इस भ्र्ष्ट राजनैतिक व्यवस्था तथा अन्याय की नींव पर टिकी हुई आर्थिक व्यवस्था से है | अर्थतंत्र का समाजतन्त्र से सीधा संबंध है !
हम आज जिस समाज व्यवस्था में जिन्दा हैं , वह शोषण , लूट और अन्याय के अमानवीय आधार पर टिकी है !
इस व्यवस्था का जन्म ही कुछ लोगों के लिए ढेर सारे लोगों के बुनियादी और जन्मसिद्ध अधिकारों का अपहरण और हत्या के लिए हुआ है ! जिस समाज में पूंजी का व्यक्ति के श्रम और योग्यता के उपर वर्चश्व हो , जिस समाज में पैसे के दम पर सब कुछ खरीदने की कानूनी छूट हो , जिस समाज में चीजों का उत्पादन इसलिए किया जाए कि बाजारों में पहुंच कर वे पसीने की चोरी को सिक्कों में तब्दील कर सकें -- उस समाज के मानवीय होने की आशा करना दुःशाहस और मूर्खता है !
भारत के कोने में फैला हुआ यह घोर नर्क कोई आकस्मिक प्रकोप नहीं ! इसकी उत्पत्ति के अपने ठोस कारण हैं , इसके उद्गम के अपने स्रोत हैं जिन्हें सदियों से छुआ नहीं गया ! जड़ को न पकड़ कर पत्तियों को पीटते रहे तो हम अपनी समस्या के साथ मूर्खतापूर्ण ढंग से निपटना चाहते हैं !
ऑफदमी के जानवर हो जाने का सीधा संबंध प्रत्यक्षत: इस अमानवीय समाज व्यवस्था से और परोक्ष रूप से और मुख्यत: इस भ्र्ष्ट राजनैतिक व्यवस्था तथा अन्याय की नींव पर टिकी हुई आर्थिक व्यवस्था से है | अर्थतंत्र का समाजतन्त्र से सीधा संबंध है !
हम आज जिस समाज व्यवस्था में जिन्दा हैं , वह शोषण , लूट और अन्याय के अमानवीय आधार पर टिकी है !
इस व्यवस्था का जन्म ही कुछ लोगों के लिए ढेर सारे लोगों के बुनियादी और जन्मसिद्ध अधिकारों का अपहरण और हत्या के लिए हुआ है ! जिस समाज में पूंजी का व्यक्ति के श्रम और योग्यता के उपर वर्चश्व हो , जिस समाज में पैसे के दम पर सब कुछ खरीदने की कानूनी छूट हो , जिस समाज में चीजों का उत्पादन इसलिए किया जाए कि बाजारों में पहुंच कर वे पसीने की चोरी को सिक्कों में तब्दील कर सकें -- उस समाज के मानवीय होने की आशा करना दुःशाहस और मूर्खता है !
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