उपभोक्तावादी संस्कृति (३) : कृत्रिमता ही जीवन
मार्च 7, 2007 अफ़लातून अफलू द्वारा
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गत प्रविष्टी से आगे
कृत्रिमता ही जीवन
कृत्रिम शहरी वातावरण में , जो उपभोक्तावादी संस्कृति का परिवेश है , फूलों की गंध , हरियाली , सूरज , चाँद और खुला आकाश मनुष्य के अनुभव या सौन्दर्यबोध के दायरे से बाहर चले जाते हैं । इनकी जगह कृत्रिम से प्रकाशित एवं सँवारा गया वातावरण , नकली घास और फूल तथा कृत्रिम सुगंधित द्रव्य लोगों का वातावरण बनाते हैं । कृत्रिम जरूरतों के दबाव में आदमी की स्वाभाविक शारीरिक और मानसिक भूख दब जाती है ।फिर तरह तरह के चटखारों से कृत्रिम भूख जगायी जाती है । चूँकि इस भूख का मनुष्य की प्रकृति से कोई सम्बन्ध नहीं होता इसे किसी भी चीज के लिए किसी भी हद तक उकसाया जा सकता है । शायद इस संस्कृति की अन्तिम परिणति उस समाज में होगी जहाँ जीव विज्ञान की ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग ‘ जैसी उपलब्धियों का प्रयोग कर मनुष्य के स्वाभाविक सौन्दर्यबोध को भ्रूणावस्था में ही समाप्त कर दिया जाएगा । इस तरह स्वभावगत सौन्दर्यबोध के नष्ट होने से भोंड़े फैशनों के प्रतिरोध का अन्तिम आधार भी खत्म हो जाएगा , और तब सुन्दर का अर्थ सीधा शक्तिशाली कम्पनियों द्वारा निर्मित और प्रचारतंत्र द्वारा प्रचारित प्रसाधन और परिधान का उपभोग करना ही हो जाएगा ।
संक्षेप में उपभोक्तावादी संस्कृति का यह गुण है कि वह अनावश्यक वस्तुओं को मनुष्य के लिए आवश्यक बना देती है और इस तरह मनुष्य की सीमित आवश्यकताओं को सीमाहीन । चूँकि आवश्यकताएँ सीमाहीन बन जाती हैं लोग दिन-रात , सारी जिन्दगी एक न एक वस्तु जुटाने में लगे रहते हैं । आदमी पर एक तरह से गुलामी हावी हो जाती है । प्रम्परागत शोषक समाजों में भी विशिष्टता जाहिर करने के लिए कुछ अनावश्यक वस्तुओं के उपभोग की ओर रुझान था । लेकिन लोगों की वस्तुपरक दृष्टि को नष्ट करने का आज जैसा विज्ञापन और प्रचार का कोई अभियान नहीं होने के कारण इसके प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि और निषेध भाव भी बना रहता था । अधिकांश पर्म्परागत धर्मों में अति ठाटबाट या असंतुलित उपभोगवृत्ति को निन्दनीय माना जाता था । चूँकि उपभोक्तावादी संस्कृति का आधार व्यावसायिकता है , उसने उपभोग को ही धर्म के रूप में खड़ा कर दिया है और इस तरह उपभोग की वृत्ति बे-रोकटोक आगे बढ़ती जाती है ।
अगला उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास
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