शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

भयंकर रोग

.......................................हमारे भारत की व्यवस्था में के मूल में उक्त गंभीर अमीर देशों के विनाश के बीच तो है ही अपने कुछ भयंकर रोग भी हैं यहां उन देशों से भी भयंकर रूप में एक सिलसिलेवार अमानवीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है अक्सर घूसखोरी और भ्रष्टाचार मिलावट और चोरी के समाचार इन देशों से आमतौर पर कम ही मिलते हैं क्योंकि इतनी ईमानदारी पोर्ट करने में किस सिटी में हुए हैं लेकिन यहां स्थिति बद से बदतर है यहां राशन और तेल की किल्लत है मुफलिसी है अभाव है हमारे देश को इन देशों की तरह सामंतवाद के पंजे से मुक्त नहीं किया गया खेती-बाड़ी पर भूस्वामी और भूत दास के संबंध खत्म नहीं किए गए इसलिए समाज में भी उस प्रकार की सामंती ढंग से सोचने की मानसिकता का अंत नहीं किया जा सका गांव में शोषण और अत्याचार की कहानी दिल दहलाने देने वाली है पिछड़ी जातियों के साथ होने वाला है मानसिक व्यवहार और स्त्री का गुलामी बेकार और दिमागी गुलामी खेतों और च** के बल पर पीढ़ियों की चिड़ियों को गुलाम बना लेने की व्यवस्था गांव की संरचना में घुन की तरह चुके हैं गांव में लोग भूमिहीन होते चले जा रहे हैं गांव में थोड़ा भी पढ़ा लिखा विद्यार्थी शहर नौकरी की खोज में भागता है तो वह एक सामंती संबंधों की मानसिकता लिए शहर पहुंचता है वहां उसे तथाकथित आधुनिकता का कचरा मिलता है जो उसकी दमित मानसिकता का ग्राहक बनता है गांव में उसने किसी हेमा मालिनी को नहीं देखा शहर में उसे पर्दे पर हेमा मालिनी देख देखने को मिलती है वह कल्पना जी भी हो जाता है उसे अच्छे-अच्छे घर देखने को मिलते हैं और एक बाजार मिलता है जिसमें सब कुछ खरीदा और बेचा जा सकता है कटु यथार्थ और कल्पना के संसार में द्वंद होता है वह बिकता है या खरीदने की कोशिश करता है नौजवान की बहुत बड़ी संख्या है जिसने स्कूल का मुंह नहीं देखा क्योंकि मजदूरी करने से ज्यादा की कल्पना करना उसके हिस्से में नहीं आया 30 फ़ीसदी पाठशाला में बैठे उनमें से पांचवीं कक्षा तक देखे गए सीकर 75 फीट जी 7 गए जिन 25 फीट जीके उसके पास जाने का मौका मिला उनमें से कुछ नहीं अपनी जिंदगी के 15 20 वर्ष एक नाकाम और वह शिक्षा से उलझने में बिताए भी तो मोहभंग हुआ गाड़ी कमाई और जिंदगी का महत्वपूर्ण वक्त एक कन्फ्यूजन को कोसने में लगे और फिर वह पाता है कि उसकी आंखों में अंधेरा है और वह स्वतंत्र है सरवाइव करने के लिए फ्री टेस्ट होने की कोशिश करनी है उसे अपनी खोपड़ी एक कदम तय करने में लगानी है उसे जैसे-तैसे स्थापित होना है जगह बनानी है इस क्रम में किस-किस को रोना है किस के भविष्य पर पैर रखकर आगे बढ़ना है किसका गला घोटना है कहां दीदी आना है और कहां मुट्ठी गर्म करनी है यह सब कुछ सब कुछ एक क्षण भी नहीं सोचना अगर वह जीवित रहना चाहता है तो अपनी ज्यादा या कम अधिकतम अनुकूलता के साथ वह एक निहायत निजी युद्ध लड़े बर्बर और जंगली होकर भी अगर वह इस निजी लड़ाई को लड़ने का जूता खो चुका है अगर वह हताश हो चुका है निरस्त हो चुका है और वहां पहुंच चुका है जहां जिंदगी से मौत सस्ती और बड़ी लगती है तो वह आराम से पटरी पर सिर रख दे नींद की गोलियां घटक जाए पागल हो जाए या प्राजोध की प्रतिक्रिया में दोषी हो जाए अपराधी हो जाए इस व्यवस्था की विशेषता है कि यह कंपटीशन के द्वारा विकास करने का दावा करती है यह कहती है कि हर व्यक्ति स्वतंत्र है और एक दौड़ में है वह चाहे जितनी उन्नति करें एक और ऐसी दौड़ हो जिसमें ढेर सारे अंधे बहरे बीमार और कुछ मोटे तगड़े औरत आदमी हो रहे हो कुछ भी सोच रहे हो कुछ रगड़ी मार कर आगे निकल रहे हो कुछ बीच में ही प्राण छोड़ रहे हो कुछ लड़खड़ा रहे हो इस प्रकार की व्यवस्था का मतलब है व्यक्ति में यह भावना भावना पैदा करना कि तुम एक अकेले आदमी हो तुम खुद ब खुद सब कुछ करना है और शिवम के लिए करना है रूम में जिस प्रकार लेरियस को लगाया जाता था और कहा जाता था कि उसे दूसरे के खत्म हो जाने तक लड़ते रहना है उसी प्रकार की व्यवस्था यह भी है यह व्यवस्था जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने की कोई गारंटी व्यक्ति को नहीं देती इसलिए यह काम व्यक्ति के ऊपर आता है ढेर सारी कुछ शाम कुछ कुछ सॉन्ग अतृप्ता और लाल साहू का पुंज बन जाता है उसके सामने कुछ रास्ते यह बसते हैं कि वह बाय हुक ओर बाय क्रुक अपने को स्थापित करें अपने को बचाए उसकी जिजीविषा जीने की इच्छा और जीने की सामग्री में ढूंढ होता है वह बेरोजगार है और अंधेरे चौराहे पर है वह बोर है और हताश है वह बिना टिकट किसी टॉकीज में घुसता है तो उसे सेक्स और क्राइम का गणगौर संसार मिलता है उसका बीमार मन एक रास्ता ढूंढ लेता है एक अस्वस्थ और मानवीय रास्ता मोहल्ले से लेकर टॉकीज के पर्दे तक एक भ्रष्ट माहौल है कहीं ताला तोड़ना सिखाया जा रहा है कहीं खलनायक ओं को डिस संदेश करके पसारना कहीं कैबरे और क्लब है कहीं छोटी गर्ल दासगुप्ता है उसे लगता है जिंदगी में दो ही काम से करने हैं 18 कार korea-18 सुंदर लड़की एक आज को मार दिया एक सुंदर लड़की बस उसकी सारी सृजनात्मक और सामाजिक चेतना की हत्या कर दी जाती है उसे लगता है पैसा कमाना जीवन का चरम उद्देश्य है और फिर उसके कमाने के ढेर सारे रास्ते उसके सामने हैं इस मानसिकता के बाद कौन सी गुंजाइश रहती है कि आप आदमी बेचारे से किसी आदमी की उम्मीद करें आप ही उम्मीद करें कि वह अपने देश को देश समझे उसमें चरित्र पैदा हो उसमें बंधुता और एकता और सहयोग की फसल आने लगे आर्थिक मछली बाजार अपना देश कैसे समझ सकता है यह कितनी शर्मनाक बात है कि हम दूसरे राष्ट्र से गिरना करके ही आदमी में तथाकथित देशप्रेम पैदा कर पाते हैं हमारे देश में देश प्रेम पाकिस्तान के युद्ध के दौरान ही पैदा होता है आखिर क्यों रेडियो से जबकि दिन-रात गंगा जमुना बहती रहती है और हिमालय खड़ा रहता है और तो और युद्ध के दिनों में बावजूद चौहान राष्ट्रप्रेम के व्यापार ज्यादा चौकस और चुस्त हो जाता है मुनाफे की चांदी बटोरने में तत्परता जगती है और देश प्रेमियों को ग्लानि तक नहीं होती इसका एकमात्र कारण है कि पूंजी की व्यवस्था में संबंधों की नियामक पूंजी होती है संबंध पूंजी के लिए होते हैं देश भाई पिता माता मित्र पत्नी आदि रिश्ते खोखले और झूठे होते हैं तनावग्रस्त होते हैं सायास होते हैं निभाए और धोए जाते हैं निराला ने एक बार कहा था स्नेह निर्झर बह गया है जो तन रह गया है यह व्यवस्था व्यक्ति को व्यक्तिवादी बनाती है और उसके बीच की सारी नैसर्गिक मानवीय शादी गुणों की निर्जना को निर्झरिणी को धोखा देती है उसकी उसके मन में वित्त वर्कशॉप देखी है उसे रेतों कार्ड बना देती है या फिर मानवी और जंगली प्रवृत्तियों का ऐसी हम इस निष्कर्ष तो हम यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि हमारी समूची मानव रचना और व्यवस्था के भ्रष्ट







सोहम यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि हमारी समूची बनो रचना और मूल्य व्यवस्था के ब्रेस्ट जंजाल का मूल्य व्यवस्था है और इसी से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक संबंधों का और सामाजिक न्याय के महत्वपूर्ण प्रशन से जुड़ा हुआ है या दूसरे दूसरे शब्दों में उत्पादन संबंधों के न्याय पूर्ण या अन्याय पूर्ण होने के बुनियादी प्रशन से जुड़ा हुआ है एक तिहाई दुनिया ऐसी है जहां व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है और उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियंत्रण हो चुका है वहां उत्पादन और वितरण में संगति की गई है और पूंजी के बचाए स्वयं को समाज रचना का मूल आधार बनाया गया है वहां किसी व्यक्ति के सम्मान का कारण उसका ध्यान नहीं उसका श्रम है इसलिए वहां एक दूसरे में अच्छा श्रमिक बनने की होड़ है फोरम से मतलब शरीर के शर्म से ही नहीं मानसिक योग्यता से भी है वहां व्यक्ति की शिक्षा उसकी रोटी रोटी उसके काम और उसके बुढ़ापे की परवरिश की गारंटी लेकर वहां की व्यवस्था ने व्यक्ति को निशंक और निर्भय बना दिया है वहां लोगों को कल की चिंता करने की जरूरत नहीं वहां बच्चे के दूध की मां की बीमारी की बिटिया के हाथ पीले करने की और बाप के बुढ़ापे की चिंता करने की जरूरत नहीं है संपूर्ण उत्पाद संपूर्ण समाज की नीति बना दिया गया है उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं जरूरत के लिए होता है व्यक्ति को उसके शर्म से अलग करके मिथिला नहीं बनाया गया वहां सब जानते हैं कि हम वितरण के पूरे हिस्सेदार हैं अजय उत्पादन का अधिक से अधिक होना हमारे सब के हित में है पूंजी की व्यवस्था से इस मूलभूत अलगाव के कारण ही वहां सुख और शांति है स्नेह और सौहार्द है प्रेम और सहयोग है लोग मिलते हैं तो मरते हैं बोलते नहीं चला कि स्वतंत्रता होते हुए भी तलाक की जरूरत नहीं होती वेश्यावृत्ति जड़ से खत्म हो चुकी है भीख मंगे सड़कों पर नहीं दिखते चोर उचक्के औरत या नहीं होते लोग कुंठित नहीं होते क्योंकि कुंठा ओं के जन्म देने वाले कारण समाप्त हो चुके हैं असमानता की खाई नहीं है जंगल में कानून नहीं है बड़ी मछली और छोटी मछली के संबंध नहीं है भविष्य की सुनहरी रोशनी और आशा को में है क्योंकि उन्हें पता है कि उनका रास्ता क्या है खेलकूद और ज्ञान विज्ञान की तरक्की में लगे हैं क्योंकि ऐसा करने की स्थिति में हुए हैं राज्य की सारी मशीनरी उसका एक-एक पुर्जा इस उद्देश्य के लिए है कि लोग सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रूप से अधिक उन्नत हो सकें स्वस्थ हो इसलिए नहीं कि चाहे लोग भ्रष्ट हो जाएं पशु हो जाएं जबकि मुनाफे की व्यवस्था पर चोट न करें यद्यपि ऐसा दावा कोई नहीं करता कि ऐसी व्यवस्था के साथ होने के साथ-साथ रातों-रात हमारे सामाजिक संबंध बदल जाएंगे नहीं हमारे सामाजिक समूह में प्रवेश करते हैं जो पूंजी की व्यवस्था के विकृत संस्कार और सड़ांध के बीच बने हैं और वे झटके के साथ आसानी से समाप्त हो जाएंगे जो इस व्यापक अमानवीयकरण के सिलसिले को शुरू करते हैं । उस आधार के अभाव में यह अमानवीयकरण ज्यादा दिन जीवित नहीं रहते क्योंकि जीवन पद्धति और उसका आधार बदल चुका होता है । लोगों की आस्था और प्रेरणा का बिंदु पूंजी की बजाय श्रम होने लगता है । लोगों को नए ढंग से जीने के लिए अभिरुचियाँ और नया दृष्टिकोण खोजने और विकसित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक उत्साह जन्मता है जीवन में एक आस्था जन्म की है आदमी पहली बार आदमी को आदमी समझता है व्यक्ति की निजता पहली बार नोट ने लगती है तुम दोनों की पहचान पहली बार उपलब्ध होती है तो यह दो रानी की जरूरत नहीं कि यह व्यवस्था हमारे लिए मिट्टी के तेल राशन और कपड़ा मकान का ही अभाव पैदा नहीं करती हमारी हमारे मानवीय गुणों को भी अपहरण करती है यह व्यवस्था हमें जानवर होने के लिए मजबूर करती है क्योंकि इसमें इसका कोई घाटा नहीं कि व्यक्ति व्यक्ति के संबंध अंतर्द्वंद से युक्त हो आदमी भ्रष्ट हो जाए निसेकोई कचरा नहीं इस अमाउंट में करण से क्योंकि यह व्यवस्था अपने आधार की प्रकृति में ही है मानवीय है और एवं व्याकरण का यह क्रम असल जगह को और धुंधला करने और असल जोर से संघर्ष मूर्ति भी करने में बहुत मदद करता है इसलिए हम हमें इस असल ठिकाने को पकड़कर इस व्यवस्था के पर्चे उखाड़ने की शीघ्र से शीघ्र कोशिश करनी चाहिए जो लोग कहते हैं कि आदमी अर्थ के लिए ही नहीं जीता और व्यवस्था परिवर्तन का सवाल सिर्फ रोजी-रोटी का सवाल है उन्हें अपनी गलती ठीक करनी चाहिए हमारी aj2j तहत केवल रोटी कपड़ा और मकान की जद्दोजहद ही नहीं यह अपने मानवीय गुणों को हासिल करने की अपनी निजता में लौट आने की अपने खोए हुए रिश्तो को जीतने की प्यार और सम्मान की जिंदगी उपलब्ध करने की जद्दोजहद है







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