शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

भयंकर रोग

.......................................हमारे भारत की व्यवस्था में के मूल में उक्त गंभीर अमीर देशों के विनाश के बीच तो है ही अपने कुछ भयंकर रोग भी हैं यहां उन देशों से भी भयंकर रूप में एक सिलसिलेवार अमानवीकरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है अक्सर घूसखोरी और भ्रष्टाचार मिलावट और चोरी के समाचार इन देशों से आमतौर पर कम ही मिलते हैं क्योंकि इतनी ईमानदारी पोर्ट करने में किस सिटी में हुए हैं लेकिन यहां स्थिति बद से बदतर है यहां राशन और तेल की किल्लत है मुफलिसी है अभाव है हमारे देश को इन देशों की तरह सामंतवाद के पंजे से मुक्त नहीं किया गया खेती-बाड़ी पर भूस्वामी और भूत दास के संबंध खत्म नहीं किए गए इसलिए समाज में भी उस प्रकार की सामंती ढंग से सोचने की मानसिकता का अंत नहीं किया जा सका गांव में शोषण और अत्याचार की कहानी दिल दहलाने देने वाली है पिछड़ी जातियों के साथ होने वाला है मानसिक व्यवहार और स्त्री का गुलामी बेकार और दिमागी गुलामी खेतों और च** के बल पर पीढ़ियों की चिड़ियों को गुलाम बना लेने की व्यवस्था गांव की संरचना में घुन की तरह चुके हैं गांव में लोग भूमिहीन होते चले जा रहे हैं गांव में थोड़ा भी पढ़ा लिखा विद्यार्थी शहर नौकरी की खोज में भागता है तो वह एक सामंती संबंधों की मानसिकता लिए शहर पहुंचता है वहां उसे तथाकथित आधुनिकता का कचरा मिलता है जो उसकी दमित मानसिकता का ग्राहक बनता है गांव में उसने किसी हेमा मालिनी को नहीं देखा शहर में उसे पर्दे पर हेमा मालिनी देख देखने को मिलती है वह कल्पना जी भी हो जाता है उसे अच्छे-अच्छे घर देखने को मिलते हैं और एक बाजार मिलता है जिसमें सब कुछ खरीदा और बेचा जा सकता है कटु यथार्थ और कल्पना के संसार में द्वंद होता है वह बिकता है या खरीदने की कोशिश करता है नौजवान की बहुत बड़ी संख्या है जिसने स्कूल का मुंह नहीं देखा क्योंकि मजदूरी करने से ज्यादा की कल्पना करना उसके हिस्से में नहीं आया 30 फ़ीसदी पाठशाला में बैठे उनमें से पांचवीं कक्षा तक देखे गए सीकर 75 फीट जी 7 गए जिन 25 फीट जीके उसके पास जाने का मौका मिला उनमें से कुछ नहीं अपनी जिंदगी के 15 20 वर्ष एक नाकाम और वह शिक्षा से उलझने में बिताए भी तो मोहभंग हुआ गाड़ी कमाई और जिंदगी का महत्वपूर्ण वक्त एक कन्फ्यूजन को कोसने में लगे और फिर वह पाता है कि उसकी आंखों में अंधेरा है और वह स्वतंत्र है सरवाइव करने के लिए फ्री टेस्ट होने की कोशिश करनी है उसे अपनी खोपड़ी एक कदम तय करने में लगानी है उसे जैसे-तैसे स्थापित होना है जगह बनानी है इस क्रम में किस-किस को रोना है किस के भविष्य पर पैर रखकर आगे बढ़ना है किसका गला घोटना है कहां दीदी आना है और कहां मुट्ठी गर्म करनी है यह सब कुछ सब कुछ एक क्षण भी नहीं सोचना अगर वह जीवित रहना चाहता है तो अपनी ज्यादा या कम अधिकतम अनुकूलता के साथ वह एक निहायत निजी युद्ध लड़े बर्बर और जंगली होकर भी अगर वह इस निजी लड़ाई को लड़ने का जूता खो चुका है अगर वह हताश हो चुका है निरस्त हो चुका है और वहां पहुंच चुका है जहां जिंदगी से मौत सस्ती और बड़ी लगती है तो वह आराम से पटरी पर सिर रख दे नींद की गोलियां घटक जाए पागल हो जाए या प्राजोध की प्रतिक्रिया में दोषी हो जाए अपराधी हो जाए इस व्यवस्था की विशेषता है कि यह कंपटीशन के द्वारा विकास करने का दावा करती है यह कहती है कि हर व्यक्ति स्वतंत्र है और एक दौड़ में है वह चाहे जितनी उन्नति करें एक और ऐसी दौड़ हो जिसमें ढेर सारे अंधे बहरे बीमार और कुछ मोटे तगड़े औरत आदमी हो रहे हो कुछ भी सोच रहे हो कुछ रगड़ी मार कर आगे निकल रहे हो कुछ बीच में ही प्राण छोड़ रहे हो कुछ लड़खड़ा रहे हो इस प्रकार की व्यवस्था का मतलब है व्यक्ति में यह भावना भावना पैदा करना कि तुम एक अकेले आदमी हो तुम खुद ब खुद सब कुछ करना है और शिवम के लिए करना है रूम में जिस प्रकार लेरियस को लगाया जाता था और कहा जाता था कि उसे दूसरे के खत्म हो जाने तक लड़ते रहना है उसी प्रकार की व्यवस्था यह भी है यह व्यवस्था जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने की कोई गारंटी व्यक्ति को नहीं देती इसलिए यह काम व्यक्ति के ऊपर आता है ढेर सारी कुछ शाम कुछ कुछ सॉन्ग अतृप्ता और लाल साहू का पुंज बन जाता है उसके सामने कुछ रास्ते यह बसते हैं कि वह बाय हुक ओर बाय क्रुक अपने को स्थापित करें अपने को बचाए उसकी जिजीविषा जीने की इच्छा और जीने की सामग्री में ढूंढ होता है वह बेरोजगार है और अंधेरे चौराहे पर है वह बोर है और हताश है वह बिना टिकट किसी टॉकीज में घुसता है तो उसे सेक्स और क्राइम का गणगौर संसार मिलता है उसका बीमार मन एक रास्ता ढूंढ लेता है एक अस्वस्थ और मानवीय रास्ता मोहल्ले से लेकर टॉकीज के पर्दे तक एक भ्रष्ट माहौल है कहीं ताला तोड़ना सिखाया जा रहा है कहीं खलनायक ओं को डिस संदेश करके पसारना कहीं कैबरे और क्लब है कहीं छोटी गर्ल दासगुप्ता है उसे लगता है जिंदगी में दो ही काम से करने हैं 18 कार korea-18 सुंदर लड़की एक आज को मार दिया एक सुंदर लड़की बस उसकी सारी सृजनात्मक और सामाजिक चेतना की हत्या कर दी जाती है उसे लगता है पैसा कमाना जीवन का चरम उद्देश्य है और फिर उसके कमाने के ढेर सारे रास्ते उसके सामने हैं इस मानसिकता के बाद कौन सी गुंजाइश रहती है कि आप आदमी बेचारे से किसी आदमी की उम्मीद करें आप ही उम्मीद करें कि वह अपने देश को देश समझे उसमें चरित्र पैदा हो उसमें बंधुता और एकता और सहयोग की फसल आने लगे आर्थिक मछली बाजार अपना देश कैसे समझ सकता है यह कितनी शर्मनाक बात है कि हम दूसरे राष्ट्र से गिरना करके ही आदमी में तथाकथित देशप्रेम पैदा कर पाते हैं हमारे देश में देश प्रेम पाकिस्तान के युद्ध के दौरान ही पैदा होता है आखिर क्यों रेडियो से जबकि दिन-रात गंगा जमुना बहती रहती है और हिमालय खड़ा रहता है और तो और युद्ध के दिनों में बावजूद चौहान राष्ट्रप्रेम के व्यापार ज्यादा चौकस और चुस्त हो जाता है मुनाफे की चांदी बटोरने में तत्परता जगती है और देश प्रेमियों को ग्लानि तक नहीं होती इसका एकमात्र कारण है कि पूंजी की व्यवस्था में संबंधों की नियामक पूंजी होती है संबंध पूंजी के लिए होते हैं देश भाई पिता माता मित्र पत्नी आदि रिश्ते खोखले और झूठे होते हैं तनावग्रस्त होते हैं सायास होते हैं निभाए और धोए जाते हैं निराला ने एक बार कहा था स्नेह निर्झर बह गया है जो तन रह गया है यह व्यवस्था व्यक्ति को व्यक्तिवादी बनाती है और उसके बीच की सारी नैसर्गिक मानवीय शादी गुणों की निर्जना को निर्झरिणी को धोखा देती है उसकी उसके मन में वित्त वर्कशॉप देखी है उसे रेतों कार्ड बना देती है या फिर मानवी और जंगली प्रवृत्तियों का ऐसी हम इस निष्कर्ष तो हम यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि हमारी समूची मानव रचना और व्यवस्था के भ्रष्ट







सोहम यह निष्कर्ष आसानी से निकाल सकते हैं कि हमारी समूची बनो रचना और मूल्य व्यवस्था के ब्रेस्ट जंजाल का मूल्य व्यवस्था है और इसी से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक संबंधों का और सामाजिक न्याय के महत्वपूर्ण प्रशन से जुड़ा हुआ है या दूसरे दूसरे शब्दों में उत्पादन संबंधों के न्याय पूर्ण या अन्याय पूर्ण होने के बुनियादी प्रशन से जुड़ा हुआ है एक तिहाई दुनिया ऐसी है जहां व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है और उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियंत्रण हो चुका है वहां उत्पादन और वितरण में संगति की गई है और पूंजी के बचाए स्वयं को समाज रचना का मूल आधार बनाया गया है वहां किसी व्यक्ति के सम्मान का कारण उसका ध्यान नहीं उसका श्रम है इसलिए वहां एक दूसरे में अच्छा श्रमिक बनने की होड़ है फोरम से मतलब शरीर के शर्म से ही नहीं मानसिक योग्यता से भी है वहां व्यक्ति की शिक्षा उसकी रोटी रोटी उसके काम और उसके बुढ़ापे की परवरिश की गारंटी लेकर वहां की व्यवस्था ने व्यक्ति को निशंक और निर्भय बना दिया है वहां लोगों को कल की चिंता करने की जरूरत नहीं वहां बच्चे के दूध की मां की बीमारी की बिटिया के हाथ पीले करने की और बाप के बुढ़ापे की चिंता करने की जरूरत नहीं है संपूर्ण उत्पाद संपूर्ण समाज की नीति बना दिया गया है उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं जरूरत के लिए होता है व्यक्ति को उसके शर्म से अलग करके मिथिला नहीं बनाया गया वहां सब जानते हैं कि हम वितरण के पूरे हिस्सेदार हैं अजय उत्पादन का अधिक से अधिक होना हमारे सब के हित में है पूंजी की व्यवस्था से इस मूलभूत अलगाव के कारण ही वहां सुख और शांति है स्नेह और सौहार्द है प्रेम और सहयोग है लोग मिलते हैं तो मरते हैं बोलते नहीं चला कि स्वतंत्रता होते हुए भी तलाक की जरूरत नहीं होती वेश्यावृत्ति जड़ से खत्म हो चुकी है भीख मंगे सड़कों पर नहीं दिखते चोर उचक्के औरत या नहीं होते लोग कुंठित नहीं होते क्योंकि कुंठा ओं के जन्म देने वाले कारण समाप्त हो चुके हैं असमानता की खाई नहीं है जंगल में कानून नहीं है बड़ी मछली और छोटी मछली के संबंध नहीं है भविष्य की सुनहरी रोशनी और आशा को में है क्योंकि उन्हें पता है कि उनका रास्ता क्या है खेलकूद और ज्ञान विज्ञान की तरक्की में लगे हैं क्योंकि ऐसा करने की स्थिति में हुए हैं राज्य की सारी मशीनरी उसका एक-एक पुर्जा इस उद्देश्य के लिए है कि लोग सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रूप से अधिक उन्नत हो सकें स्वस्थ हो इसलिए नहीं कि चाहे लोग भ्रष्ट हो जाएं पशु हो जाएं जबकि मुनाफे की व्यवस्था पर चोट न करें यद्यपि ऐसा दावा कोई नहीं करता कि ऐसी व्यवस्था के साथ होने के साथ-साथ रातों-रात हमारे सामाजिक संबंध बदल जाएंगे नहीं हमारे सामाजिक समूह में प्रवेश करते हैं जो पूंजी की व्यवस्था के विकृत संस्कार और सड़ांध के बीच बने हैं और वे झटके के साथ आसानी से समाप्त हो जाएंगे जो इस व्यापक अमानवीयकरण के सिलसिले को शुरू करते हैं । उस आधार के अभाव में यह अमानवीयकरण ज्यादा दिन जीवित नहीं रहते क्योंकि जीवन पद्धति और उसका आधार बदल चुका होता है । लोगों की आस्था और प्रेरणा का बिंदु पूंजी की बजाय श्रम होने लगता है । लोगों को नए ढंग से जीने के लिए अभिरुचियाँ और नया दृष्टिकोण खोजने और विकसित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक उत्साह जन्मता है जीवन में एक आस्था जन्म की है आदमी पहली बार आदमी को आदमी समझता है व्यक्ति की निजता पहली बार नोट ने लगती है तुम दोनों की पहचान पहली बार उपलब्ध होती है तो यह दो रानी की जरूरत नहीं कि यह व्यवस्था हमारे लिए मिट्टी के तेल राशन और कपड़ा मकान का ही अभाव पैदा नहीं करती हमारी हमारे मानवीय गुणों को भी अपहरण करती है यह व्यवस्था हमें जानवर होने के लिए मजबूर करती है क्योंकि इसमें इसका कोई घाटा नहीं कि व्यक्ति व्यक्ति के संबंध अंतर्द्वंद से युक्त हो आदमी भ्रष्ट हो जाए निसेकोई कचरा नहीं इस अमाउंट में करण से क्योंकि यह व्यवस्था अपने आधार की प्रकृति में ही है मानवीय है और एवं व्याकरण का यह क्रम असल जगह को और धुंधला करने और असल जोर से संघर्ष मूर्ति भी करने में बहुत मदद करता है इसलिए हम हमें इस असल ठिकाने को पकड़कर इस व्यवस्था के पर्चे उखाड़ने की शीघ्र से शीघ्र कोशिश करनी चाहिए जो लोग कहते हैं कि आदमी अर्थ के लिए ही नहीं जीता और व्यवस्था परिवर्तन का सवाल सिर्फ रोजी-रोटी का सवाल है उन्हें अपनी गलती ठीक करनी चाहिए हमारी aj2j तहत केवल रोटी कपड़ा और मकान की जद्दोजहद ही नहीं यह अपने मानवीय गुणों को हासिल करने की अपनी निजता में लौट आने की अपने खोए हुए रिश्तो को जीतने की प्यार और सम्मान की जिंदगी उपलब्ध करने की जद्दोजहद है







शनिवार, 25 जनवरी 2020

Raghu

Jawaharlal Nehru University’s unique admissions policy ensures that students come from all corners of the country, from all socio-economic backgrounds. The JNU learning experience takes place both inside and outside the classroom, in the debates and discussions that the university is famous for, and in the struggles and agitations that make headlines.
Of the many thousands of students who have passed through the portals of Jawaharlal Nehru University (JNU) over the past five decades, few would say that the time they spent in JNU did not transform their lives, world view and social attitudes.
Classroom studies in JNU, mostly at the postgraduate level except for fresh entrants to the foreign languages courses, are themselves quite different from those of most other universities. The course content is framed somewhat differently and is taught and tested by most faculty with considerable rigour in a semester system, and in a manner that challenges rote learning and encourages critical thinking. Self-study of texts from the rather extensive reading lists is a must. If a student goes on to do research, s/he is pushed to even more rigorous self-study, and to an interpretive and critical approach towards both academic works and social reality. Teachers, too, interact with students as adults capable of comprehending subjects on their own without the need to be spoon-fed. Essay-type questions in examinations, term papers and seminar presentations, and a well-stocked library, make the JNU learning experience distinctive in India, certainly in the social sciences, humanities, liberal arts, policy and governance, and the distinctive school of international studies with foundational education in international politics, and later specialisation in different regions of the world, in diplomacy, disarmament and international law.
JNU students and alumni would also aver that, however good the curricular side is, much more learning is achieved outside the classroom at this university. At JNU, the process of seeking to critically understand the world around us takes place to a considerable extent in the almost endless debates and discussions that the university is famous for, and in the struggles and agitations which make the most headlines.

Night meetings

The post-dinner public meetings around the year, especially as part of the students’ union election process, have traditionally been an important part of the learning process at JNU. There are, of course, also several meetings organised during the day, but since lectures by visiting academics from India and abroad as well as classes, seminars or tutorials are also held during these hours, the night meetings held in the messes of the different hostels have always held a special place in JNU campus life. These meetings usually involve JNU student leaders, academics, activists, public intellectuals and political party representatives sharing their views on important national and international issues, followed by intensive discussions. The presentations and discussions are mostly well-informed, bring in diverse viewpoints and ideological perspectives, cover a vast range of subjects and bring in insights and perspectives gleaned from both curricular and extracurricular sources. One has seen many a meeting, including pre-election ones, with over 400 students sitting or standing wall-to-wall, with many dozens sitting on the floor, studiously taking notes. This was probably as important a part of their education, both in an academic sense and which informed their perspectives as enlightened and involved citizens in later life. This is what a good education ought to mean, but is so seldom obtained in India, given either the deprivation or the elitism in so many universities and institutions in the country.

Sociocultural diversity

Adding to this conceptual diversity is the geographic and sociocultural diversity of JNU. There are few institutions of higher learning where students come from all corners of the country in substantial numbers, from all socio-economic, caste and tribal backgrounds. Much of this is due to the unique admissions policy in JNU, albeit considerably diluted now, introduced after considerable struggle by the student body, especially on the Left. You would therefore find in JNU many first-generation university students studying in English medium for the first time and bringing with them diverse experiences from their vastly different backgrounds. These students bring their own distinct perspectives into the campus discourse inside as well as outside the classrooms, and take away with them from JNU a high-quality formal education as well as a critical sociopolitical understanding that is not only specific to contemporary issues but also provides a more generalised perspective which informs their thinking and activities in the future.
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सोमवार, 20 जनवरी 2020

आज हिन्दुस्तान में असली लड़ाई सब के लिए शांति, सुरक्षा , सम्मान ,आर्थिक सुरक्षा  और न्याय की है , रोज़गार की  है, सरकारी नौकरी की नहीं अपितु गरिमामय  एवं सुरक्षित  रोज़गार एवं व्यवसाय की  है. और शायद अब तो सब से बड़ी लड़ाई साफ़ हवा और पानी की  है. पर हिन्दू राष्ट्र जैसे मुद्दे हमें  इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने  ही नहीं देते. कभी मंदिर , कभी घरवापसी, कभी लव ज़हाद इत्यादि  मुद्दों  पर ही हमारा धयान लगाया जा रहा है जानबूझकर बहुत सुनियोजित तरीके से | 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

MANMOHAN

व्यवस्था का अमानवीयकरण
मनमोहन
टाज अगर अपने चारों और देखना शुरु करें तो लगेगा कि हम चापलूसों ईर्ष्यालुओं,स्वार्थियों,हत्यारों, कायरों, कुंठितों,कुत्सितों,पराजितों और शरीर और मन के गुलामों या भ्रष्ट व्यवसायियों के बीच फंसे हुए ऐसे ही कोई आदमीनुमा जन्तु हें। सरा देश एक जुगल का खूबसूरत दृश्य पेश उपस्थित कर रहा है, जहां लोग झगड़ रहे हैं, एक दूसरे को खा रहे हैंए भाग रहे हैं, रो रहे हैं, नाच और गा रहे हैं,भूखे मर रहे हैं, तबाह हो रहे हैं, तबाह कर रहे हैं, जिससे जो बन पड़ रहा है, वह कर रहा है। एक मुक्त युद्ध शुरु हो गया है, हर आदमी की निगाहों में एक क्रूर स्वार्थी चमक है। किसी कि आंखों में भीख है, याचना है, गिड़गिड़ाहट है, किसी कि आंखों में तिरिस्कार है, उपेक्षा है, एक शातिर परायापन है, एक चालाक ‘बिजनिस मैन शिप ’ है। रिश्ते रश्म अदायगी हो चुके हैं। ‘ क्या हाल चाल है?’ पूछने वाले का अपना हाल चाल पूछने और जानने का कोर्ठ मन्तव्य नहीं होता। दीपावली पर शुभ कामना कार्ड भेजने वाले के दिल में अक्सर कोई शुभ भावना आपके लिए नहीं होती। लोग होली पर भी मिलते हैं पर ऐसे जैसे दो लाशों को जर्बदस्ती गले मिलाया जा रहा हो।दो घर जिनकी छतें मिली हुई हैं एक दूसरे से सबसे अधिक डाह करते हैं। दो खेत जिसकी एक ही मेंड है एक दूसरे के खून के प्यासे हैं।दो कलर्क  जो एक ही कतार में दिन भर बराबर बैठ कर काम करते हैं - एक दूसरे के दुश्मन हैं।एक का प्रोमोशन दूसरे का दुख होगा। हर व्यकित, हर दूसरे के बारे में हर तीसरे से कानाफूसी करता हुआ मिलेगा। सब धोखा धड़ी से नजरें बचाकर अपनी गोटी फिट करने में व्यस्त हैं। लोग दूसरों को धोखा दे रहे हैं, अपने आप को धोखा दे रहे हैं, दुहरी जिन्दगी जी रहे हैं, अपने आप से भाग रहे हैं, अपनी निजता खो रहे हैं,अपने आत्म सममान को चूर चूर होता हुआ दैख रहे हैं। खुलम खुल्ला दिन की रोशनी में अन्याय और अत्याचार हो रहा है और देखने वाले बचकर गुजर रहे हैं, यहां जतक कि उसमें रस ले रहे हैं, दया भी कर रहे हैं, बस इतनी जितनी टीका टिप्पणी के लिए जरुरी है।हम लोग आये दिन रोंगटे खड़े हो जाने वाली खबरें पढ़ रहे हैं। देख रहे हैं।अध्यापक के सीने पर चाकू विद्यार्थी रखता है, विद्यार्थी से आर्थिक व्यवसाय अध्यापक करता है। कालेज हॉस्टल में, कोतवाली में ब्लात्कार होते हैं, पुलिस के संरक्षण में हत्या होती है, भाग्य विधाता और कानून निर्माता तस्करी औरघोटाले करते हैं। बाप बेटी का गला घोंट रहा है क्योंकि उसके पास उसकी शादी के लिए दहेज नहीं, बेटा बाप के लिए सोच रहा है कि इसका बुढ़ापे का पीरियड कब खत्म हो जिससे उसका बजट थोड़ा ढीला हो सके, पति पत्नीको पीट रहा है, पत्नी पति को कोस रही है। आप कुछ सिक्कों में किसी का कत्ल कर सकते हैं, आप किसी की इज्जत उतार सकते हैं।
यह सब क्या हो गया है?
यह सब क्या हो रहा है?
इस सब का कारण क्या है?
क्या यह सब आकस्मिक है ? क्या यह सब दैवीय प्रकोप है ? क्या यह  गोस्वामी तुलसीदास जी की भविष्यवाणी मात्र है -- कि कलयुग आ गया है ,जिसका कोई परिहार  नहीं,कोई हल नहीं ,कोई इलाज नहीं | या फिर क्या यह अपनी पिछली संस्कृति को भूल जाने  पश्चिम की होड़ करने का कुफल है ? क्या यह सब इसलिए है कि सब स्वार्थी और भ्रष्ट हो गए हैं |  या यह सब इसलिए है कि कोई कर्तव्य नहीं करना चाहता और अधिकार पहले मांगता है |? 
        जो लोग मनुष्य की निसर्गत स्वार्थी मानते हैं , वे वस्तुत : या तो  नासमझ होते हैं या फिर चालाक |  मनुष्य प्रकृति की सबसे अधिक सँवेदनशील  कृति है |  मनुष्य सम्मान कर सकता है , प्यार कर सकता  है ,सहयोग क्र सकता है ,और बलिदान कर सकता है | इन सारे गुणों का जन्म , इनका विकास और इनकी सुरक्षा वह केवल तब  है जब की ऐसा करने के लिए उसका परिवेश उसे प्रेरित और बाध्य करे |  उसकी जीवन पद्धति  से सारे मानवीय मूल्यों का संबंध अंतर्विरोध से युक्त न हो |  उसके चारों और की हवाएं ,उसके वातावरण के इर्द गिर्द उसके लिए ऐसा माहौल पैदा करें जिसमें उसे अधिक मानवीय और अधिक उत्तरदायी होने के लिए स्फुरण मिले |  प्यार , सहयोग, कर्त्तव्य और सामाजिकता का बोध ये सब एस्प्रो की गोलियां नहीं जिन्हें निगलते ही व्यक्ति प्यार, सहयोग, कर्त्तव्य करना शुरू करदे | ये ऐसे गुण  हैं जो व्यक्ति के अभ्यांतर से , पैदा होते हैं |  जो उसकी इच्छा और उसके संस्कार होते हैं , इन्हें थोंपा या चिपकाया नहीं जा सकता |  इन गुणों का जन्म सायास नहीं कर सकता |  कोई इसलिए प्यार नहीं कर सकता कि उसे प्यार करना है |  कोई इसलिए किसी का सम्मान नहीं क्र सकता कि उसे सम्मान करना चाहिए |  बल्कि वह  इसलिए ऐसा करता है क्योंकि वह  ऐसा करने के ;लिए अंदर से विवश होता है | अंदरूनी मनोभाव अनायास स्वतस्फूर्त होते हैं |  अगर ऐसा नहीं होता तो वहां नाटक होता है |  सो , इस व्यापक अमानवीकरण का कारण यह नहीं होता कि हमने अच्छी अच्छी बातें बताने में और उपदेश पम्प करने में कोई कोताही की है | 'चाहिए ' वाली भाषा में बात करने वाले लोग हमेशा यथार्थ से दूर होते हैं और इसलिए हमेशा यथार्थ का अवैज्ञानिक विश्लेषण और हल देते हैं|  वे व्यक्ति मन की प्रकृति का अध्ययन नहीं करते  और इसलिए अपनी तमाम सदिच्छा के बावजूद वे कोई भी तर्कसंगत , ठोस और व्यावहारिक तथा कारगर हल नहीं देते |  वे यथार्थ के चरित्र को न समझकर उसे आदर्श में बदलने की जल्दबाजी में तो रहते हैं , परन्तु बदलाव की कोई असली योजना उनके पास नहीं होती |  इसकी एकमात्र बात यह है कि वे कार्य और कारण की सही सही पहचान करने में चूक जाते हैं |
           भारत के कोने में फैला हुआ यह घोर नर्क कोई आकस्मिक प्रकोप नहीं ! इसकी उत्पत्ति के अपने ठोस कारण हैं , इसके उद्गम के अपने स्रोत हैं जिन्हें सदियों से छुआ नहीं गया ! जड़ को न पकड़ कर पत्तियों को पीटते रहे तो हम अपनी समस्या के साथ मूर्खतापूर्ण ढंग से निपटना चाहते हैं !
          ऑफदमी के जानवर हो जाने का सीधा संबंध प्रत्यक्षत: इस अमानवीय समाज व्यवस्था से और परोक्ष रूप से और मुख्यत: इस भ्र्ष्ट राजनैतिक व्यवस्था तथा अन्याय  की नींव पर टिकी हुई आर्थिक व्यवस्था से है | अर्थतंत्र का समाजतन्त्र से सीधा संबंध है !
   हम आज जिस समाज व्यवस्था में जिन्दा हैं , वह  शोषण , लूट और अन्याय के अमानवीय आधार पर टिकी है !
इस व्यवस्था का जन्म ही कुछ लोगों के लिए ढेर सारे लोगों के बुनियादी और जन्मसिद्ध अधिकारों का अपहरण और हत्या के लिए हुआ है ! जिस समाज में पूंजी का व्यक्ति के श्रम और योग्यता के उपर वर्चश्व हो , जिस समाज में पैसे के दम पर सब कुछ खरीदने की कानूनी छूट हो , जिस समाज में चीजों का उत्पादन इसलिए किया जाए कि बाजारों में पहुंच कर वे पसीने की चोरी को सिक्कों में तब्दील कर सकें -- उस समाज के मानवीय होने की आशा करना दुःशाहस और मूर्खता है !