मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

पाला खाप का


पाला  खाप का  
खरी खोटी
रणबीर
यह गोत की गोत मैं शादी का मामला आखिर पिछले आठ-दस साल मैं क्यों इतना जोर पकड़ग्या? इसके घणे कारण हो सकैं सैं। जब-जब समाज मैं आर्थिक और सामाजिक संकट बढ़े सैं तब-तब इनसे जूझने के प्रयास भी तेज हो जाते हैं। इस संकट से जूझने के प्रयासों की मुख्य तौर पर तीन दिशाएं देखी जा सकती हैं। पहली दिशा है जिसमें समाज का बड़ा हिस्सा इस संकट का समाधान अपनी पुरानी परम्पराओं में ढूंढऩे लगता है। मतलब समाज को फिर से चौहदवीं सदी की तरफ ले जाने के प्रयास तेजी पकडऩे की कोशिश करते हैं। दूसरी दिशा के लोग यह मानते हैं किकुछ नहीं होना-हवाना ऐसा ही है। इसे बदला नहीं जा सकता। मतलब ये लोगदेयर इज नो आलटरनेटिवअर्थातटीना सिन्डरोमके शिकार हैं। साथ ही यह भी सच है कि इन लोगों को वर्तमान दौर बहुतसूत रहा है और इनकी पांचों घी मैं सैं इसलिए ये इस संकट से जूझने की बात नहीं करते। तीसरी दिशा है समाज को आगे बढ़ाने कीख् पिछड़े अवरोधों को पार करके संतुलित विकास की तरफ ले जाने की। वर्तमान संकट में बढ़ती असमानताओं के चलते हुए सीमान्त किसान में वर्गीय चेतना का विकास होने की मूलभूत संभावनाएं बढ़ रही हैं। इस वर्ग को गोत-नात का सांचा इस संकट से लडऩे के लिएओछी जूतीके रूप में दिखाई देता है और इसका खुद का अनुभव इसे ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। किसान में वर्गीय चेतना पैदा ना हो इसलिए यहां के शासक वर्ग भी यही चाहते हैं कि वह चौहदवीं सदी की ओर मुड़ कर अन्धी गली में घूमता रहे और इस संकट के जनक शासकों की तरफ देखने की हिम्मत ही कर सके। इसीलिए उतर भारत के किसान की वर्गीय चेतना को कुन्द करने के लिए गोत की गोत में शादी के एकाध अपवाद को बड़ी सारे समाज की गम्भीर समस्या बना कर पेश किया जा रहा है ताकि यह इसी में उलझे रहें। याद हो तो पंजाब के किसान ने कई बरसों पहले अपनी किसानी मांगों को केन्द्र में लाने के लिए चण्डीगढ़ को घेरने की योजना बनाई थी। हरियाणा के किसान ने उसकी अम्बाला के इलाके में आव-भगत करके अपनी सहानुभूति का प्रदर्शन किया था। उस घिराव के कुछ दिन बाद ही भिन्डरांवाला जी अमृतसर में उभरते हैं और पूरी दिशा खालिस्तान की तरफ बदल दी जाती है और पंजाब की किसानी की एकता को काफी गहरी ठेस पहुंचती है जिसके सदमे से वह आज तक नहीं उबर पाई है। लगता है पूरे उत्तर भारत की किसानी के संकट को अपनी सही दिशा पर जाने से रोकने के लिए यह जात पात गोत-नात के मुद्दे सामने लाकर इनकी एकता को तोडऩे का बड़ा षड्यंत्र है और हम इसके शिकार हो गये हैं। अपने तुच्छ राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए दबंग तबकों का यह खेल है। सोचो किसान साथियो। सोचो। सोच्चण की फुरसत किसनै सै। गेर रै गेर पत्ता गेर। हरफां के पूछड़ ठा-ठा कै देखण लागरे सैं? सांझ नै एक अद्धा भीतर अर फेर ये सारी बात बाहर। के जरुरत सै माथा मारण की। याहे तो म्हारा शासक चाहवै सै अक ये खापां की रैली अटैंड करें जा अर दारु पीकै लुढ़के पड़े रहवैं।

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