राष्ट्रवाद को समझना
जब हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई के शुरुआती दो में , शहीदों में से एक, खुदीराम बोस ने फांसी का फंदा गले में डालते हुए विदाई के गीत ' हांसी हांसी पोरबो फांसी, देखबें मोर देशबासी' गाया जिसका अर्थ था, कि "मैं खुशी खुशी फांसी पर चढ़ा और मेरे देशवासी मुझे इस बात के लिए याद रखेंगे।"
भगत सिंह के "इंक़लाब जिंदाबाद " के नारे ने , भारत में ब्रिटिश शासन की खिलाफत करने के लिए एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया। इस ताकतवर साम्राज्यवादी शक्ति की भारतीयों पर बढ़ती निर्दयता के खिलाफ जनता को एकजुट करने के लिए भगत सिंह की यह बात हमेशा याद रखी जायेगी कि" कानून की शुचिता लंबे समय तक , जनता की इच्छा के बिना नहीं बनाए रखी जा सकती।।"
भारत के युवाओं को चंद्रशेखर आजाद के ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान उन अमर शब्दों को याद करने की जरूरत है-- "अगर अभी तक आपका खून नहीं खौलता है, तो वह पानी है जो कि आपकी रगों में बह रहा है । तो युवाओं का यह रक्त किस काम का जो अगर मातृ भूमि की सेवा के काम ना आ सके है।"
जब ब्रिटिश नौसेना के युवा भारतीयों ने , बम्बई बंदरगाह की ओर अपने जहाजों का रूख किया और बंदूकें चलाने से मना कर दिया और देश भर में मजदूरों ने एकजुटता दिखाते हुए , अपने औजारों और उपकरणों को रखकर काम बंद कर दिया।
आजादी के लिए हमारे इस संघर्ष ने पूरे देश की एकजुटता के उस सपने को साकार कर दिया जिसके लिए वर्षों से मेहनत की रही थी।
क्रान्तिकारी कवि अशफाकउल्लाह खान के शब्दों में यह सपना नहीं है और यदि है तो वह यह होना चाहिए कि हम अपने बच्चों को भी इसके खिलाफ संघर्ष करते हुए देखें जिस साम्राज्यवाद को खत्म करने का बीड़ा उठाया गया है ।
औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए जनता की एकता के सपने , का सिर्फ एक रंग नहीं था । औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रवाद का उदय सिर्फ मातृ भूमि को मुक्त कराने के अर्थ से बहुत आगे निकल गया था। भारतीय राष्ट्रवाद इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह है , जिसमें देश में विभिन्न हिस्सों में बसी जनता ने स्वतंत्र, गौरवशाली और पूर्णतः नियंत्रित स्वतंत्र राष्ट्र, जो स्वयं अपना भाग्य विधाता हो , का सपना देखा और इसी सपने ने भारतीय दृष्टि का निर्माण किया ।
यहाँ महिलाओं और पुरुषों , गरीब और अमीर, मजदूरों और किसानों , सभी धर्मों के लोगों के लिए समान ज़थं है । जाति, धर्म और लिंग से परे यह अविभाज्य एक राष्ट्र के रूप में स्थापित है । भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के समय एक संघर्ष यह भी था कि देश शोषण और अन्याय के सभी बन्धनों से मुक्त रहे।
रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में , जिस समाज या राष्ट्र में जनता को सम्मान और भय मुक्त जीवन हो, मुफ्त शिक्षा हो वह राष्ट्र अपनी संकीर्णता के दायरे से बाहर निकल जाता है। यह गौर करने की बात है कि भारतीय राष्ट्र के बारे में टैगोर की सोच सामजिक न्याय और गरिमा के साथ साथ, ज्ञान प्राप्त करने की स्वतंत्रता के बारे में भी है । सभी समुदायों और जातियों के प्रति सम्मान के बारे में वे इंगित करते हैं ।
सबका देश हमारा देश
रणबीर सिंह दहिया
9812139001
राष्ट्रवाद को समझना -2
भारतीय राष्ट्रवाद का मुख्य आधार किसी भी रूप में हो रहे शोषण से मुक्ति है। गांधी जी के शब्दों में हमारे राष्ट्रवाद से किसी और राष्ट्र को खतरा नहीं हो सकता क्योंकि जैसे हम अपने साथ शोषण की अनुमति नहीं देते हैं बिलकुल उसी तरह दूसरे राष्ट्र के शोषण के पक्ष में भी नहीं हैं। गांधी जी साम्राज्यवादी राष्ट्र जैसे ब्रिटेन और भारतीय राष्ट्रवाद की निर्धारित करते हुए कहते हैं कि साम्राज्यवाद राष्ट्रीयता नहीं यह एक बुराई है , संकीर्णता, स्वार्थीपन, एकात्मवाद है जिस पर आधुनिक राष्ट्र में प्रतिबंध लगना चाहिए।
बाबासाहेब अम्बेडकर ने आगे दलील दी कि राष्ट्रवाद तब तक खोखला नारा है जब तक शोषितों की मुक्ति शामिल नहीं की जाती । यह संभव है कि राष्ट्र एक इकाई के रूप में हो लेकिन समाजशास्त्रीय दृष्टि से तब तक नहीं जब तक उसमें समाज के समस्त वर्गों को सम्मान नहीं दिया जाता। राष्ट्र की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ समस्त वर्गों खास तौर पर गुलामी या दासता कर रहे वर्ग की स्वतंत्रता से है । सरोजिनी नायडू भी इसी धारा को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि जब तक हम भाईचारे की भावना बनाये रखने में महारत हासिल नहीं करते तब तक यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि हम साम्प्रदायिक नहीं हैं और एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हो गए हैं ।
स्वतंत्र भारत में राष्ट्रवाद की विस्तृत परिभाषा में विदेशी सत्ता के शोषण से मुक्त , सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक रूप से स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी शामिल है। राष्ट्रवाद सिर्फ भौतिक सीमाओं की सुरक्षा भर नहीं है बल्कि अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज भी है।
यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि इसी समय में जब जनता की पूर्ण स्वतंत्रता के विचार के साथ भारतीय राष्ट्रवाद को व्यापकता में परिभाषित किया जा रहा था उसी समय दूसरे विचार के साथ राष्ट्रवाद को धर्म और जातीय आधारित संकीर्णता के रूप में भी परिभाषित किया जा रहा था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ चल रहे आजादी के संघर्ष ने राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के विचार को विकसित करने में और मदद की। इसी समय यह दो व्यापक और संकीर्ण विचारधारा विकसित हो रही थी। राष्ट्रवाद के इन दो विचारधाराओं की जड़ें अठाहरवीं शताब्दी में यूरोप से प्रारम्भ हुई थी।
सबका देश हमारा देश
डॉ रणबीर सिंह दहिया
9812139001
आधुनिक राष्ट्र का उदभव
आधुनिक राष्ट्र का उदभव - नागरिक राष्ट्रवाद बनाम रक्तिय और नस्लीय
राष्ट्रवाद
‘राष्ट्र’ की आधुनिक परिभाषा अठारहवीं सदी के यूरोप में उभरी । इससे पहले वहां पर राजाओं और शासकों का राज्य था । उनकी रियासतों की अपनी सीमायें थी , लेकिन कोई भी एक देश नहीं था । उदाहरण के तौर पर देखें तो आस्ट्रो -हंगेरियन साम्राज्य, तुर्क साम्राज्य मध्य यूरोप के लगभग आधे हिस्से में था , ब्रिटिश साम्राज्य इंग्लैंड के बाहर की दुनिया केे एक बडे़ हिस्से में फैला था । फ्रेंच और जर्मन ,जो बार- बार यूरोप में एक दूसरे से युद्ध लड़ रहे थे, यहां पर एक राष्ट्र की कोई अवधारणा नहीं थी । प्रत्येंक समाज अपनी सीमाओं और विभिन्न धार्मिक समूहों के रुप में आपस में संघर्ष कर रहे थे जैसे- कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक दूसरे का विरोध कर रहे थे । दोनों ने पूर्वी रुढ़िवादी चर्च का विरोध किया । राष्ट्रों की अवधारणा , अठारहवीं सदी में परिभाषित की गई । कार्ल मार्क्स ने इसे पूजीवाद के तहत बाजार की आर्थिक सीमा कहा । यह आधुनिक राष्ट्र -राज्य का आधार बना।
राष्ट्र -राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया में पहचान हेतु एक सार्वजानिक सांस्कृतिक मापदंड बनाये गए ा इसमें सबसे अधिक भाषा को पहचान मिली | यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सबसे पहला भाग था | भाषाओँ ,जिसके द्वारा हम यूरोप में सबसे अधिक देशों की पहचान आज करते हैं जैसे अंग्रेजी।, फ्रेंच ,इतालवी, डच ,जर्मन , पुर्तगाली , स्पेनिश आदि | अपनी पहचान को बनाये रखने के लिए इन देशों का संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है | भाषाओँ की एक से अधिक संख्या की वजह से प्रमुख भाषा की पहचान के लिए विवाद हुए | जैसे स्पेन में केटलोनिआ (बार्सिलोना के आसपास ) में लोगों का तर्क है कि कैटलन भाषा स्पेनिश भाषा से अलग है , फिर भी केटलिन भाषा को स्पेनिश के रूप में वर्गीकृत किया गया है | इस प्रकार राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया साधारण नहीं है कि अचानक , एक राष्ट्र का रूप ले ले | एक राष्ट्र के उभार में बड़े सांस्कृतिक आदान - प्रदान का योगदान है | साथ ही अक्सर , हिंसक संघर्ष की भी हिस्सेदारी होती है | राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में पूंजीवाद बाजार की स्थापना के साथ साथ एक भाषा को भी राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित होते देखा गया है |
लेकिन क्या एक राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिभाषा को एक दो अलग अलग तरीकों से समझा जा सकता है | दोनों परिभाषाओं में क्षेत्र या देश को एक भौगोलिक सीमा से परिभाषित किया गया है , जिसमें एक सीमाओं पर केंद्रित है जबकि दूसरी जनता को केंद्रित करती है | नागरिक राष्ट्रवाद के विचा को फ़्रांसिसी क्रांति से प्रेरणा मिलती है | जिसके अनुसार वे सभी लोग , जो देश की सीमा के भीतर रहते हैं फ़्रांस के पूर्ण नागरिक हैं | इसलिए सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप में देखा गया और इसलिए " स्वतंत्रता , समानता,और भाईचारे" का नारा दिया गया | फ़्रांसिसी क्रांति ने न केवल सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को उखाड़ फैंका है , बल्कि फ़्रांस में रहने वाले , सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता का अधिकार दिया है जिसमें यहूदी भी शामिल थे |
राष्ट्रवाद
‘राष्ट्र’ की आधुनिक परिभाषा अठारहवीं सदी के यूरोप में उभरी । इससे पहले वहां पर राजाओं और शासकों का राज्य था । उनकी रियासतों की अपनी सीमायें थी , लेकिन कोई भी एक देश नहीं था । उदाहरण के तौर पर देखें तो आस्ट्रो -हंगेरियन साम्राज्य, तुर्क साम्राज्य मध्य यूरोप के लगभग आधे हिस्से में था , ब्रिटिश साम्राज्य इंग्लैंड के बाहर की दुनिया केे एक बडे़ हिस्से में फैला था । फ्रेंच और जर्मन ,जो बार- बार यूरोप में एक दूसरे से युद्ध लड़ रहे थे, यहां पर एक राष्ट्र की कोई अवधारणा नहीं थी । प्रत्येंक समाज अपनी सीमाओं और विभिन्न धार्मिक समूहों के रुप में आपस में संघर्ष कर रहे थे जैसे- कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक दूसरे का विरोध कर रहे थे । दोनों ने पूर्वी रुढ़िवादी चर्च का विरोध किया । राष्ट्रों की अवधारणा , अठारहवीं सदी में परिभाषित की गई । कार्ल मार्क्स ने इसे पूजीवाद के तहत बाजार की आर्थिक सीमा कहा । यह आधुनिक राष्ट्र -राज्य का आधार बना।
राष्ट्र -राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया में पहचान हेतु एक सार्वजानिक सांस्कृतिक मापदंड बनाये गए ा इसमें सबसे अधिक भाषा को पहचान मिली | यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का सबसे पहला भाग था | भाषाओँ ,जिसके द्वारा हम यूरोप में सबसे अधिक देशों की पहचान आज करते हैं जैसे अंग्रेजी।, फ्रेंच ,इतालवी, डच ,जर्मन , पुर्तगाली , स्पेनिश आदि | अपनी पहचान को बनाये रखने के लिए इन देशों का संघर्ष का एक लम्बा इतिहास है | भाषाओँ की एक से अधिक संख्या की वजह से प्रमुख भाषा की पहचान के लिए विवाद हुए | जैसे स्पेन में केटलोनिआ (बार्सिलोना के आसपास ) में लोगों का तर्क है कि कैटलन भाषा स्पेनिश भाषा से अलग है , फिर भी केटलिन भाषा को स्पेनिश के रूप में वर्गीकृत किया गया है | इस प्रकार राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया साधारण नहीं है कि अचानक , एक राष्ट्र का रूप ले ले | एक राष्ट्र के उभार में बड़े सांस्कृतिक आदान - प्रदान का योगदान है | साथ ही अक्सर , हिंसक संघर्ष की भी हिस्सेदारी होती है | राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में पूंजीवाद बाजार की स्थापना के साथ साथ एक भाषा को भी राष्ट्रीय पहचान के रूप में स्थापित होते देखा गया है |
लेकिन क्या एक राष्ट्र और राष्ट्रवाद की परिभाषा को एक दो अलग अलग तरीकों से समझा जा सकता है | दोनों परिभाषाओं में क्षेत्र या देश को एक भौगोलिक सीमा से परिभाषित किया गया है , जिसमें एक सीमाओं पर केंद्रित है जबकि दूसरी जनता को केंद्रित करती है | नागरिक राष्ट्रवाद के विचा को फ़्रांसिसी क्रांति से प्रेरणा मिलती है | जिसके अनुसार वे सभी लोग , जो देश की सीमा के भीतर रहते हैं फ़्रांस के पूर्ण नागरिक हैं | इसलिए सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप में देखा गया और इसलिए " स्वतंत्रता , समानता,और भाईचारे" का नारा दिया गया | फ़्रांसिसी क्रांति ने न केवल सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को उखाड़ फैंका है , बल्कि फ़्रांस में रहने वाले , सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता का अधिकार दिया है जिसमें यहूदी भी शामिल थे |
जिन लोगों ने इस धारणा को आगे बढ़ाया या उससे प्रभावित थे, जो जर्मनी के अतीत और उनके पूर्वजों से आकर्षित थे उन्होंने नस्लीय शुद्धता की बात पर जोर दिया। यह एक काल्पनिक अतीत पर आधारित था , जैसा कि हम जानते हैं कि दुनिया में कोई भी देश नहीं है जहां पर सिर्फ एक ही तरह के लोगों की आबादी निवास करती हो । आबादी का आवागमन अलग अलग जगहों पर चलता रहता है । शुद्ध जर्मन राष्ट्र की यह अवधारणा सिर्फ एक मिथक है कि एक राष्ट्र उसके मूल निवासी की नस्लीय विशेताओं के साथ एक विशेष नस्ल की पहचान पर आधारित है। यह अपवर्ज नात्मक राष्ट्रवाद कुछ मनमाने ढंग की विशेषता पर आधारित है, जबकि सभी दूसरों को छोड़कर लोगों में से एक नस्ल में शामिल है ।
यूरोपीय इतिहास के अंतिम तीन सौ साल में राष्ट्र की इन दो विवादास्पद विचारों का एक प्रतिबिम्ब बनाया गया है। इस तरह के समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्र को बनाने के प्रयास को आगे बढ़ाया गया। उदाहरण के लिए , डेनमार्क और नार्वे से कैथोलिक और फ़्रांस से प्रोटेस्टेंट को बाहर किया गया । यूरोप में सैंकड़ों साल तक समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रों के निर्माण के लिए युद्ध होते रहे । युद्ध , नरसंहार , जातीय सफाई और अल्पसंख्यक जनता के निर्वासन का खूनी इतिहास यूरोपीय राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा है।
रक्त और नस्लीय राष्ट्र की अवधारणा ने जर्मनी में फासीवाद को जन्म दिया । जिनके भी पूर्वज जर्मनी में निवास नहीं करते थे वे शुद्ध जर्मन नहीं माने जाते थे। और उनके लिए जर्मनी में कोई स्थान नहीं था । यह हिटलर की बुनियादी समझ थी । इस आधार पर जर्मनी में यहूदियों और जिप्सी को मारा गया । इस प्रकार जर्मनी में फासीवाद का उदय हुआ और द्वीतीय विश्व युद्ध के एक ख़राब प्रभाव के साथ समापन हुआ ।
हिटलर और जर्मनी में अन्य फासिस्टों के प्रस्तावित राष्ट्रवाद का यह रूप पौराणिक अतीत में अपने मूल में नहीं था । समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रवाद के विपरीत दूसरी परिभाषा का निर्माण सैकड़ों - हजारों सालों से लोगों के बीच बातचीत के माध्यम से निर्मित हुआ है । साझा संस्कृति का उद्भव , सांझी ( या कई भाषाओं के देशों में ) भाषा और एक राष्ट्र के रूप में एक साझा उद्देश्य से प्रेरित राष्ट्रवाद का परिणाम है । यूरोपीय राष्ट्रों के उद्भव में बातचीत एवम खूनी संघर्ष के एक साथ हुए थे ।
यूरोपीय इतिहास के अंतिम तीन सौ साल में राष्ट्र की इन दो विवादास्पद विचारों का एक प्रतिबिम्ब बनाया गया है। इस तरह के समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्र को बनाने के प्रयास को आगे बढ़ाया गया। उदाहरण के लिए , डेनमार्क और नार्वे से कैथोलिक और फ़्रांस से प्रोटेस्टेंट को बाहर किया गया । यूरोप में सैंकड़ों साल तक समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रों के निर्माण के लिए युद्ध होते रहे । युद्ध , नरसंहार , जातीय सफाई और अल्पसंख्यक जनता के निर्वासन का खूनी इतिहास यूरोपीय राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा है।
रक्त और नस्लीय राष्ट्र की अवधारणा ने जर्मनी में फासीवाद को जन्म दिया । जिनके भी पूर्वज जर्मनी में निवास नहीं करते थे वे शुद्ध जर्मन नहीं माने जाते थे। और उनके लिए जर्मनी में कोई स्थान नहीं था । यह हिटलर की बुनियादी समझ थी । इस आधार पर जर्मनी में यहूदियों और जिप्सी को मारा गया । इस प्रकार जर्मनी में फासीवाद का उदय हुआ और द्वीतीय विश्व युद्ध के एक ख़राब प्रभाव के साथ समापन हुआ ।
हिटलर और जर्मनी में अन्य फासिस्टों के प्रस्तावित राष्ट्रवाद का यह रूप पौराणिक अतीत में अपने मूल में नहीं था । समरूप रक्त और नस्लीय राष्ट्रवाद के विपरीत दूसरी परिभाषा का निर्माण सैकड़ों - हजारों सालों से लोगों के बीच बातचीत के माध्यम से निर्मित हुआ है । साझा संस्कृति का उद्भव , सांझी ( या कई भाषाओं के देशों में ) भाषा और एक राष्ट्र के रूप में एक साझा उद्देश्य से प्रेरित राष्ट्रवाद का परिणाम है । यूरोपीय राष्ट्रों के उद्भव में बातचीत एवम खूनी संघर्ष के एक साथ हुए थे ।
राष्ट्रवाद को समझना
* जिस समय चीन ने अपनी तकनीकी क्षमताओं में वृद्धि की उसी समय भारत ने अपने बाजार विदेशी पूंजी के लिए खोल दिए ।
* विदेशी पूंजी को केवल तकनोलॉजी के लिए ही आमंत्रित नहीं किया बल्कि विदेशी कंपनियों को अधोसंरचना विकसित करने की भी इजाजत दी।
* पर-निर्भर आर्थिक पथ ने मैन्युफैक्चरिंग क्ष्रेत्र भारी औद्योगिक मन्दी को जन्म दिया।
* जो भी आर्थिक वृद्धि हुई , वह मुख्यतः सेवा-क्षेत्र से प्राप्त हुई। उदाहरण के लिए सेल फोंन'क्रांति' के कारण दूरसंचार में भारी स्थानीय बाजार पैदा होने के बावजूद, उपकरण निर्माण में गिरावट दर्ज की गई। कुछ ही देशी भारतीय कंम्पनियां निर्माण के क्षेत्र में शामिल हुई परन्तु अधिकांश हैंडसेट्स थोक में बाहरी देशों से आयात किये गए। जो यहाँ बने, उनमें भी अधिकांश मैन्युफैक्चरिंग चीन में होती है।
* यहाँ तक कि दवा निर्माण क्षेत्र में भी, जहाँ जेनेरिक दवाओं के उत्पादन में भारत का महत्वपूर्ण स्थान है, आज भारतीय कंपनियां थोक में सक्रिय चिकित्सीय तत्वों को चीन से आयात कर दवा बनाकर पैकेज़ करती है।
* चीन ने अपनी पंचवर्षीय योजनाओं को ही जारी नहीं रखा बल्कि उसके साथ साथ उसने मध्यम एवं लम्बी अवधि की योजनाएं भी बनाई हुई हैं जिनका फैलाव दशकों तक हैं।बुनियादी ढांचा निर्माण, शहर, विज्ञानं एवम प्रौद्योगिकी विकास , और यहाँ तक कि नवाचार विकसित करने की योजनाएं चीन ने बनाई हैं।
* यह दिलचस्प है कि मेड इन चीन 2025 नमक योजना इसने आरम्भ की है।
* इसके विपरीत हमारी वर्तमान सरकार ने योजना आयोग को समाप्त कर सभी योजनाओं को ही त्याग दिया है और अब हमारे पास केवल दंतविहीन नीति आयोग है।
* हमारी आर्थिक योजनाओं को अस्वीकार कर विदेशी ताकतों द्वारा नियंत्रित बाजार के हवाले कर दिया है जिनकी रूचि राष्ट्र हित न होकर विदेशी हितों की सेवा करना है।
* हम पुनः प्रश्न पूछते हैं कि क्या यह वृहद पैमाने पर राष्ट्र विरोधी नहीं है?
* मौजूदा सरकार इस बात को स्वीकार नहीं करती कि आज प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ज्ञान महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए एप्पल कम्पनी जो विश्व में सबसे बड़ी कम्पनी है ( बाजार पूंजीकरण के मामले में) इसकी आर्थिक ताकत कई समानांतर कम्पनियों से अधिक है । फिर भी इसकी अपनी एक भी फैक्ट्री नहीं है । यह आई फोन और मैक कम्प्यूटर "उत्पादित" करती है। यह कैसे करती है ? इसके पास डिजाइन है, साफ्टवेयर है और अपना एप्पल ब्रांड है। इस सबसे यह चीन की कम्पनी फॉक्सकोन को एप्पल ब्रांड के उत्पादों जैसे कि आई -फोन इत्यादि का निर्माण करने पर मजबूर कर सकती है जिसकी एवज में उसे अल्पपारितोषिक देती है। एक गणना के अनुसार एप्पल कम्पनी एक आई फोन से $ 300 कमाती है और फॉक्सकोन को देती है मात्र $ 7। यह है ज्ञान अर्थव्यवस्था की प्रकृति ।
* लोगों की क्षमताओं में वृद्धि किये बिना विदेशी पूंजी को न्यौता देना निश्चित रूप से "राष्ट्रवादी" कदम नहीं है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ' मेक इन इंडिया' के प्रचार प्रसार के बावजूद भी औद्योगिक क्षेत्र में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है । जबकि हर वर्ष लगभग एक करोड़ बीस लाख लोग रोजगार के बाजार में प्रवेश करते हैं परंतु मात्र 67% ही संगठित क्षेत्र में रोजगार प्राप्त कर पाते हैं । शेष या तो बेरोजगार हो जाते हैं या कैजुअल रोजगार प्राप्त करते हैं जो अनिश्चितता में जीते हैं ।
* एक राष्ट्र वादी कौन है ?
हम विचार विमर्श के लिए एक बुनियादी सवाल उठाते हैं । आज राष्ट्रवादी कौन है? जो लोग हमारे मूल्यों और स्वतंत्रता आंदोलन के सपनों को आगे लेकर बढे हैं? जो लोग भारत की मजबूती को देखना चाहते हैं , एकजुटता को, विविधता में एकता दिखाना चाहते हैं? या वे लोग जो भारत को कमजोर बनाते हैं , यह कह कर क़ि केवल खास तरह की संस्कृति,कुछ प्रकार की परम्पराओं को ही भारत में सम्मान दिया जायेगा। क्या एक व्यक्ति या व्यक्ति-समूह या एक सरकार राष्ट्रवादी होने का दावा कर सकती है जब वह इसके साथ -साथ हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के नियंत्रण को विदेशी ताकतों के हवाले करके हमारे लोगों के जीवन को ही खतरे में डाल रही हो । राष्ट्रवाद और गैर राष्ट्रवाद के बीच असली बहस यही है ।
सबका देश हमारा देश अभियान
रणबीर
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