बुधवार, 11 दिसंबर 2019

शिक्षा जन्म सिद्ध अधिकार होना चाहिए ,भीख नहीं*

शिक्षा जन्म सिद्ध अधिकार होना चाहिए ,भीख नहीं*
हक...जेएनयू के छात्र अपनी ही नहीं बल्कि देश में गरीब वर्ग में पैदा हुए बच्चों के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं

*स्वरा भास्कर*
*वॉलीवुड अभिनेत्री और जेएनयू की पूर्व छात्रा*
दैनिक भास्कर रोहतक 23 नवम्बर , 2019
जितेंद्र सुना है जब जेएनयू में एडमिशन के लिए पर्चा भरा तो वो दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर थे। वे अपनी काबलियत के दम पर पास हुए और अब इतिहास में पीएचडी कर रहे हैं । 18 नवम्बर को जब वे बाकी जेएनयू छात्रों के साथ फीस में 600% कई बढ़ोतरी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे तो दिल्ली पुलिस ने उनपर लाठी चार्ज किया। उनके साथ दृष्टिहीन साथी शशिभूषण थे जो जेएनयू में एमए के छात्र हैं । इनके पिता नहीं हैं , माता गोरखपुर में रहती हैं । शशि गायक हैं और शो करके जो कमाते हैं उससे वे जेएनयू की सब्सिडाइज्ड फीस भरते हैं। इन्होंने भी दिल्ली पुलिस के हाथों अपनी छाती पर लाठी और बूट खाये। जबकि पुलिस को पता था कि वे दृष्टिहीन हैं । अब वे एम्स में भर्ती हैं ।
पिछले दो तीन हफ्तों से मीडिया के एक वर्ग ने जेएनयू स्टूडेंट्स के खिलाफ झूठा और सिलेक्टिव प्रचार शुरू कर दिया । सोशल मीडिया पर भक्तगणों और आईटी सेल द्वारा पैदा किये गए हैंडल्स ने जेएनयू के छात्रों के झूठे फोटो और मीम्स फैलाये । छात्रों की उम्र और चरित्र को लेकर भद्दे झूठ कहे। जबकि दिलचस्प बात यह है कि सत्ताधारी भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी के जेएनयू यूनिट भी पूरी तरह इस विरोध का समर्थन कर रहा है और बाकायदा विरोध प्रदर्शनों में भाग भी ले रहा है।
आखिर मुद्दा है क्या?
दरअसल जेएनयू प्रशासन ने छात्रों की फीस बढ़ाने का निर्णय लिया था जिससे *शिक्षा और होस्टल की फीस में 600% की बढ़ोतरी हुई है।* जहां छात्र पहले 12 हजार रूपये सालाना फीस भरते थे।
जिसमें पढ़ने ,रहने, खाने,का सब खर्च निकल जाता था, वहीं नई फीस के चलते छात्रों को 60 से 66 हजार रुपये सालाना की फीस भरनी होगी।जेएनयू में दाखिल छात्रों में से *43% ऐसे छात्र हैं जिनके परिवारों की मासिक आमदनी 12 हजार रूपये से कम है।* एक ऐसा परिवार जो साल का 1.4 लाख रुपया कमाता है वो एक बच्चे की पढ़ाई पर 60-70 हजार रुपये खर्च कैसे करेगा ? 43%छात्रों में से 25% गरीबी रेखा के नीचे आनेवाले परिवारों से हैं । बीपीएल का डेटा हर राज्य से अलग है, लेकिन एक सरकारी वेब साइट के मुताबिक 2250 रूपये से कम मासिक आय वाले सभी बीपीएल में आते हैं। बीपीएल छात्रों को दी गई छूट के तहत भी नई फीस के चलते उन्हें 4000 रूपये महीना भरना होगा।
गणित ही बता रहा है कि ये नया फीस स्ट्रक्चर छात्रों के भविष्य के लिए यमदूत है। *जान लें कि जेएनयू में 55% छात्र लड़कियां हैं।* नए फीस स्ट्रक्चर की गाज सबसे पहले इन छात्राओं पर पड़ेगी। क्योंकि भारत जैसे देश में अगर बेटा और बेटी के बीच चुनना पड़े कि खर्च किस पर करना है तो ज्यादातर परिवार शायद बेटे को पढ़ाएंगे। कई दिनों तक छात्र जेएनयू के अंदर ही विरोध करते रहे, घेराव किया, नारे लगाए, पर जेएनयू वीसी एम जगदीश ने उनकी एक ना सुनी, बल्कि कई हफ्तों से कैम्पस छोड़ लापता हो गए। अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्रों ने जब विरोध कर 18 नवम्बर को सुबह संसद की ओर एक शांतिपूर्ण मार्च निकाला तो दिल्ली पुलिस ने कई छात्रों को गिरफ्तार किया और बर्बरता से पीटा भी। ये सवाल उठाना जरूरी है कि जेएनयू के छात्रों ने ऐसा क्या पाप कर दिया जो मीडिया , सोशल मीडिया के नफरती और कुछ संघी वक्ता उनको इतना कोस रहे हैं? क्या शिक्षा हमारा संवैधानिक हक नहीं है? *क्या भारत जैसे देश में जहां 53.7% आबादी मल्टी डायमेंशनल पॉवर्टी यानी बहु पहलू गरीबी का शिकार है, क्या ऐसे देश में अच्छी क्वालिटी की उच्च शिक्षा सिर्फ अमीरों और समृद्ध परिवारों के नसीब में हो ये सही है?* क्या उच्च शिक्षा सिर्फ अमीरों के नसीब में आने वाली वस्तु होनी चाहिए?
*शिक्षा का हक हमारे संवैधानिक मूल अधिकारों में से एक है ।* और जो भी सरकार सत्ता में है उसकी जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा को समान रूप से देश के हर छात्र , चाहे वह जिस भी तबके के हो , उस तक पहुंचाए । इसलिए जरूरी है कि उच्च शिक्षा को सरकार सब्सिडाइज करे। उसपर बजट में फिलहाल सिर्फ 3% खर्च करती है , जिसे बढ़ाये।उच्च शिक्षा को निजी धंधे की तरह मुनाफे के लिए या कॉस्ट रिकवरी मॉडल की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए । खासकर भारत जैसे गरीब देश में , शिक्षा को एक इन्वेस्टमेंट के रूप में देखा जाना चाहिए । *मुफ्त में अच्छी शिक्षा देना , देश के भविष्य में इन्वेस्ट करना है*।यूरोप के विकसित देश यह बात समझते हैं, इसलिए वहां के कई देशों में उनके नागरिकों के लिए शिक्षा मुफ्त है। वे इसे अपने ह्यूमन रिसोर्स में इन्वेस्टमेंट मानते हैं। जेएनयू एक ऐसा संस्थान है जिसने अपनी कम से कम फीस और एडमिशन पॉलिसी के चलते न जाने कितने गरीब छात्रों को मौका दिया है, ताकि उनका सन्दर्भ उनके लिए बेड़ी न बन जाये । शिक्षा एक ऐसा वरदान है जो आपको अपने जन्म के यथार्थ से ऊपर उठने का मौका देता है । *शिक्षा परिवारों को पीढ़ी दर पीढ़ी जारी गरीबी के चक्रव्यूह से निकालने की ताकत रखती है।* मैं जब जेएनयू में थी , तब हमारे एक सीनियर ने आईएएस का एग्जाम पास किया था। उनके पिता जी तमिलनाडु में हाईवे पर टायर ठीक करने का काम करते थे । एक और लड़की थी जिसके माता पिता बिहार में दिहाड़ी मजदूर थे और आज वह लड़की कालेज में टीचर है। मेरा करीबी एक दोस्त झारखंड के एक गांव से था।उसके पिता जी एक फैक्ट्री में काम करते थे । 4000 रूपये महीने की कमाई से वे 1000-1000 रूपये जेएनयू में पढ़ रहे अपने 3 बेटों की फीस के लिए भेजते थे। बाकी बचे 1000 रूपये में गांव का घर चलता था। उनके तीनों बेटे आज अलग -अलग नौकरियां कर रहे हैं। एक ने इंग्लैंड जाकर पोस्ट डॉक्टरेट किया है।
ये मनोहर कहानियां नहीं,जेएनयू की हकीकत है। *ये एक खूबसूरत संभावना है, जो उच्च शिक्षा को सब्सिडाइज करने से हकीकत बन सकती है। जेएनयू के छात्र दरअसल सिर्फ अपनी निजी लड़ाई नहीं बल्कि इस देश में मध्य , निचले और गरीब वर्ग में पैदा हुए हर बच्चे के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं । उन्हें कोसने,उनका मजाक उड़ाने की बजाय *हमें मांग करनी चाहिए कि इस देश में हर प्रान्त में दासियों जेएनयू बनें।* क्योंकि शिक्षा किसी रईसजादे की बपौती नहीं , भीख में दी गई वस्तु नहीं, बल्कि हमारा हक है। और सबका जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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