बुधवार, 11 दिसंबर 2019

हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति

आज
मित्रो ओर नागरिको,
आज चारों तरफ बुराई का बोलबाला नजर आता है । इन्सानी मूल्य और इन्सानियत की भावनाएं , उनसे जुड़े विचार और काम जैसे बिखरे हुए हैं। पूरा समाज गहरे संकट में है। हमारा देश भी इस चौतरफा संकट में घिरा हुआ है। हम जानते हैं कि हमारा देश असंख्य लोगों की कुर्बानियों से आजाद हुआ। आजादी की लड़ाई में उभरे न्याय, समानता व स्वतन्त्रता के मूल्यों के आधार पर हमने अपना संविधान अपनाया। संविधान में ‘नागरिक समाज’ बनाने का लक्ष्य रखा गया और देश के आत्मनिर्भर विकास को मुख्य काम समझा गया।
आजादी के संघर्षों के दौरान चले समाज सुधार आन्दोलनों ने जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके पर आधारित संकीर्ण पहचानों को एक हद तक तोड़ा। राष्ट्रीय आन्दोलन में विविधता की पहचान भी हुई, साथ ही , सभी तबकों की एकजुटता से जागरुकता व आत्मविश्वास का माहौल बना।
आज स्थिति उल्ट चुकी है। हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य, लोगों की इच्छाएं , आकांक्षाएं और उन की क्षमताएं जैसे रौंद दी गई हैं। आत्मनिर्भरता का लक्ष्य छोड़ कर विकसित देशों की और अमरीका की आर्थिक सांस्कृृतिक गुलामी स्वीकारी जा रही है। हमारी खेती , रोजगार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, खाद्यान्न,पर्यावरण, जमीन ,जंगल सब संकट में हैं। विदेशी कम्पनियों की लूट बढ़ती जा रही है। हमारा पूरा देश और समाज लाचारी महसूस कर रहा है। हम आत्महीनता के दौर से गुजर रहे हैं। समाज के तमाम तबके अभाव, दुख, निराशा ,असुरक्षा, और हिंसा के बढ़ते चक्के के नीचे पिस रहे हैं। खाना, दवा, शिक्षा,सुरक्षा और सहयोग की कमी है। तनाव और असुरक्षा ने सामाजिक माहौल बिगाड़ दिया है। बड़े पैमाने पर हत्याएं,आत्महत्याएं,और लूटपाट हो रही हैं। लाचारी और आत्महीनता के घेरे को तोड़ने की कोशिशें भी खूब हो रही हैं।
इन हालात में सभी तबके अपने अपने ढंग से इन्सानियत को बचाने की कोशिश में नगे हैं। लेकिन इनसे व्यापक फिजा बदल नहीं रही है। इस कोशिश को एक व्यापक समाज सुधार आन्दोलन और नवजागरण का स्वरुप देना बहुत जरुरी हो गया है। हमने ऐसे आन्दोलन की जरुरत सन 1983 में जनवादी सांस्कृृतिक मंच के माध्यम से हरियाणा में की थी। इस आन्दोलन में आजादी के बाद की गई अपनी भूलों को समझ कर आगे बढ़ने की दिशा बनाने की आवश्यकता है। अपना आत्मविश्वास और पहलकदमी फिर से पा सकें। गहरे संकट के इस दौर को पलटने के लिए हमें अपने सामाजिक जीवन की बुराईयों से लड़ना ही पड़ेगा।
हमारे सामाजिक जीवन में जात पात , अंधविश्वास , पर्दाप्रथा, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार,भ्रूण हत्या, यौन उत्पीड़न और दहेज हत्या आदि समस्याएं बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। हरियाणा में शिक्षित लोगों में व्यक्तिवादी सोच हावी है और सामाजिक सरोकार कमजोर हो रहे हैं। गांवों की सामूहिकता में भी खाप , जात तथा गोत्र का बोलबाला बढ़ा है। क्या करें?
1 हमें जात गोत , लिंग , सम्प्रदाय और इलाके के भेदभाव को छोड़कर इनके बीच समानता पर आधारित मानवीय भावना को फिर से स्थापित करना होगा।
2 युवा तबके यानि युवा लड़के लड़कियों को समाज सुधार के रचनात्मक काम में लगाना होगा।
3 दलित ,अल्पसंख्यक , महिलाएं, युवा और सभी शहरी देहाती वंचित तबकों के साथ शिक्षित मध्यवर्ग, अध्यापकों,कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, संस्कृतकर्मियों, मजदूरों और किसानों को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
4 हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति पिछले कई सालों से इस व्यापक नवजागरण आन्दोलन के लिए प्रयास रत है।
उम्मीद है आप भी इसमें अपना सक्रिय योगदान किसी न किसी तरीके से देंगे।
रणबीर सिंह दहिया
9812139001

अरुण माहेश्वरी

सोचनीय लेख
आज 6 दिसम्बर। यह दिन हर बार उस ‘90 के दशक के शुरूआती सालों की यादों को ताजा कर देता है, जब ‘जय श्री राम’ के नारो से ‘हेल हिटलर’ (Heil Hitler) की अनुगूंज सुनाई देती थी। विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) की धर्म-संसद भारत के संविधान को रद्दी की टोकरी में डाल कर धर्म-आधारित राज्य का एक नया संविधान तैयार करने के प्रस्ताव पारित कर रही थी। 21 साल पहले इसी दिन संघ परिवार की छल-कपट की राजनीति का एक चरम रूप सामने आया था और निकम्मी केंद्रीय कांग्रेस सरकार को धत्ता बताते हुए कार सेवक नामधारी भीड़ से बाबरी मस्जिद को उसी प्रकार गिरवा दिया गया, जिस प्रकार कभी जहरीले सांप्रदायिक प्रचार से उन्मादित नाथूराम गोडसे के जरिये महात्मा गांधी की हत्या करायी गयी थी।
6 दिसंबर 1992 की इस घटना के बाद ही आरएसएस के रहस्य को खोलने के उद्देश्य से हमने उसपर काम शुरू किया जो अंत में एक पुस्तक ‘आर एस एस और उसकी विचारधारा’ के रूप में सामने आया। आज उसी पुस्तक के पहले अध्याय के शुरूआती दो पृष्ठों को अपने मित्रों के साथ साझा कर रहा हूं :
1.छल-कपट की लम्बी परम्परा
छह दिसम्बर 1992 की घटना से सारा देश सन्न रह गया था। अनेक पढ़े-लिखे, सोचने-समझनेवाले लोग भी जैसे किंकर्तव्य-विमूढ़ हो गए थे। आधुनिक भारत में एक संगठित भीड़ की बर्बरता का ऐसा डरावना अनुभव इसके पहले कभी नहीं हुआ था। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद का यह मुद्दा वैसे तो लम्बे अर्से से बना हुआ है। पिछले चार वर्षो से इस पर खासी उत्तेजना रही है। खासतौर पर विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल नामक संगठन इस पर लगातार अभियान चलाते रहे हैं। दूसरी ओर से बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी भी किसी-न-किसी रूप में लगी हुई थी। सर्वोपरि, भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना रखा था तथा उसके सर्वोच्च नेता इन अभियानों में अपनी पूरी शक्ति के साथ उतरे हुए थे। उनके इन अभियानों से फैली उत्तेजना से देश भर में भयानक साम्प्रदायिक दंगे भी हुए जिनमें अब तक हजारों लोगों की जानें जा चुकी हैं। इसके पहले 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के शासनकाल में भी कार सेवकों ने इस विवादित ढाँचे पर धावा बोला था। उस समय भी भारी उत्तेजना पैदा हुई थी जिसमें पुलिस को ढाँचे की रक्षाके लिए गोली चलानी पड़ी थी। ऐसे तमाम हिंसक अभियानों के बाद भी चूँकि वहाँ बाबरी मस्जिद सुरक्षित रही, इसीलिए भारत की जनता का बड़ा हिस्सा काफी कुछ आश्वस्त सा हो गया था। हर थोड़े समय के अन्तराल पर भाजपा के नए-नए अभियानों-कभी शिलापूजन, तो कभी पादुका पूजन आदि-से लोगों के चेहरों पर शिकन तो आती थी, लेकिन भारत में अवसरवादी राजनीति के अनेक भद्दे खेलों को देखने का अभ्यस्त हो चुके भारतीय जनमानस ने साम्प्रदायिक उत्तेजना के इन उभारों को भी वोट की क्षुद्र राजनीति का एक अभि अंग समझकर इन्हें एक हद तक जैसे पचा लिया था। सपने में भी उसे यह यकीन नहीं हो रहा था कि यह प्रक्रिया पूरे भारतीय समाज के ऐसे चरम बर्बरीकरण का रूप ले लेगी। यही वजह रही कि छह दिसम्बर की घटनाओं से उसे भारी धक्का लगा। साम्प्रदायिक घृणा के प्रचार के लम्बे-लम्बे अभियानों का साक्षी होने के बावजूद एक बार के लिए पूरा राष्ट्र सकते में आ गया।
संत्रस्त राष्ट्र
सिर्फ केन्द्रीय सरकार ने ही बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की उस घटना को चरम विश्वासघात नहीं कहा, देश के तमाम अखबारों, बुद्धिजीवियों, सभी गैर-भाजपा राजनीतिक पार्टियों और आम-फहम लोगों तक ने इसे देश के साथ किया गया एक अकल्पनीय धोखा बताया। अयोध्या में कार सेवक नामाधरी भीड़ ने एक विवादित ढाँचे को नहीं गिराया था, पूरे राष्ट्र को एक अन्तहीन गृहयुद्ध में धकेल देने का बिगुल बजाया था। राष्ट्र इस कल्पना से सिहर उठा था कि अब तो सार्वजनिक जीवन से हर प्रकार की मर्यादाओं के अन्त की घड़ी आ गई है। सिर्फ राजनीतिक, संवैाधनिक और धार्मिक ही नहीं, सभ्यता और संस्कृति की मर्यादाएँ भी रहेंगी या नहीं, पूरा समाज इस आशंका से संत्रस्त हो गया था। लोगों की नजरों के सामने प्राचीनतम सभ्यता वाले वैविध्यमय महानता के भारत का भावी चित्र एक-दूसरे के खून के प्यासे, बिखरे हुए अनगिनत बर्बर कबीलोंवाले भूखंड के रूप में कौंध गया था। यही वजह थी कि छह दिसम्बर के तत्काल बाद भारत के किसी अखबार ने साम्प्रदायिक उत्तेजना और बर्बरता को बढ़ावा देनेवाली वैसी भूमिका अदा नहीं की जैसी कि दैनिक अखबारों के एक हिस्से ने 30 अक्टूबर, 1990 की घटनाओं के वक्त अदा की थी जब बाबरी मस्जिद पर पहला हमला किया गया था।
आडवाणी का कपट
इसी क्रम में कई अखबारों ने अकेले अयोध्या प्रकरण के सन्दर्भ में भारतीय जनता पार्टी के अनगिनत परस्पर विरोधी बयानों की फेहरिस्त भी छापी। अंग्रेजी दैनिक ’’स्टेट्समैन’’ ने 11 दिसम्बर, 92 के अपने अंक में 1 दिसम्बर से 8 दिसम्बर 92 के बीच लाल कृष्ण आडवाणी के ऐसे परस्पर-विरोधी वक्तव्यों के उद्धरण प्रकाशित किए जो उन्होंने वाराणसी से मथुरा तक की अपनी यात्रा के दौरान और फिर मस्जिद को ढहा दिए जाने के उपरान्त दिए थे। आडवाणी की तरह के नेता हर नए दिन अपनी बातों को बदलकर एक प्रकार का दिग्भ्रम पैदा करने में कितने माहिर हैं, इसे ’’स्टेट्समैन’’ की इन उद्धृतियों से जाना जा सकता है :
’’वाराणसी, 1 दिसम्बर : ’’हम किसी मस्जिद को गिराकर मन्दिर बनाना नहीं चाहते। जन्मभूमि स्थल पर कोई मस्जिद थी ही नहीं। वहाँ राम की मूर्तियाँ है और हम वहाँ सिर्फ मन्दिर बनाना चाहते हैं...गलत आचरणों और नियम के खिलाफ जनतान्त्रिक प्रतिवाद हमारे देश की एक प्राचीन परम्परा है...कार सेवा का अर्थ भजन और कीर्तन नहीं होता। हम उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अधिगृहीत 2.77 एकड़ भूमि पर बेलचों और इटों से कार सेवा करेंगे।’
आजमगढ़, 1 दिसम्बर : ’’हम शान्तिपूर्ण कार सेवा चाहते हैं लेकिन केन्द्र तनाव पैदा कर रहा है।’
मऊ, 2 दिसम्बर, : ’’छह दिसम्बर से कार सेवा शुरू होगी। सभी कार सेवक अयोध्या में 2.77 एकड़ पर कायिक श्रम करेंगे, सिर्फ भजन नहीं गाएँगे।’
गोरखपुर, 3 दिसम्बर, जहाँ उन्होंने इस खबर को गलत बताया जिसमें उनकी इस बात का उल्लेख किया गया था कि कारसेवा में बेलचों और इटों का इस्तेमाल किया जाएगा : ’’कार सेवक पूरी तरह से नियन्त्रण में रहेंगे। कारसेवा प्रतीकात्मक होगी। मैंने ऐसी (बेलचों और इटों के इस्तेमाल की तरह की) बात कभी नहीं कही। फिर भी गलत खबर के कारण सदन में हंगामा होने से लोक सभा का ओ दिन का कामकाज खराब हो गया।’
2 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश में एक आम सभा में लोगों को कारसेवा के लिए अयोध्या पहुँचने का आान करते हुए वे कहते हैं : ’’कमर कसकर उतर पड़ो। इस बात की परवाह न करो कि कल्याण सिंह सरकार बनी रहती है या गिरा दी जाती है।’
नई दिल्ली, 7 दिसम्बर : ’’यह (मस्जिद को गिराना) दुर्भाग्यजनक था। मैंने और उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री ने इसे रोकने का भरसक प्रयत्न किया, लेकिन हुआ ऐसा कि हम अयोध्या पर जन भावनाओं की तीव्रता का अनुमान नहीं लगा पाए। हम चाहते थे कि मन्दिर वैाधानिक और कानूनी तरीकों से निर्मित हो।’
नई दिल्ली, 8 दिसम्बर : ’’आज जब एक पुराने ढाँचे को जो 50 वर्ष से ज्यादा काल से मस्जिद नहीं रह गया है, न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति तथा कार्यपालिका की मन्दबुद्धि और अदूरदर्शिता से क्रुद्ध लोगों ने गिरा दिया है तो उन्हें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा राजनीतिक पार्टियाँ राष्ट्र के प्रति विश्वासघात, संविाधन का विध्वंस आदि क्या नहीं कह कर कोस रहे हैं। अयोध्या आन्दोलन के दौरान जाहिर हुए इस नग्न दोहरे मापदण्ड के चलते ही हिन्दुओं में क्रोध और अपमान की भावनाएँ आ रही हैं।’
आडवाणी के उपरोक्त सारे बयान कितने परस्पर विरोधी और कपटपूर्ण थे इसे कोई भी आसानी से देख सकता है। पिछले चार-पाँच वर्षों के दौरान अगर किसी ने भी आडवाणी की बातों पर ध्यान दिया होगा तो वह तत्काल इस निष्कर्ष तक पहुँच सकता है कि हवा के हर रुख के साथ गिरगिट की तरह फौरन रंग बदलने की कलाबाजी में आडवाणी सचमुच बेमिसाल हैं। इसके साथ ही यह भी सच है कि आडवाणी के इस गुण ने ही पिछले कुछ वर्षों में उन्हें संघी राजनीति के शीर्षतम स्थान पर पहुँचा दिया है।
*अरुण माहेश्वरी जी के फेस बुक से*

शिक्षा जन्म सिद्ध अधिकार होना चाहिए ,भीख नहीं*

शिक्षा जन्म सिद्ध अधिकार होना चाहिए ,भीख नहीं*
हक...जेएनयू के छात्र अपनी ही नहीं बल्कि देश में गरीब वर्ग में पैदा हुए बच्चों के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं

*स्वरा भास्कर*
*वॉलीवुड अभिनेत्री और जेएनयू की पूर्व छात्रा*
दैनिक भास्कर रोहतक 23 नवम्बर , 2019
जितेंद्र सुना है जब जेएनयू में एडमिशन के लिए पर्चा भरा तो वो दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर थे। वे अपनी काबलियत के दम पर पास हुए और अब इतिहास में पीएचडी कर रहे हैं । 18 नवम्बर को जब वे बाकी जेएनयू छात्रों के साथ फीस में 600% कई बढ़ोतरी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे थे तो दिल्ली पुलिस ने उनपर लाठी चार्ज किया। उनके साथ दृष्टिहीन साथी शशिभूषण थे जो जेएनयू में एमए के छात्र हैं । इनके पिता नहीं हैं , माता गोरखपुर में रहती हैं । शशि गायक हैं और शो करके जो कमाते हैं उससे वे जेएनयू की सब्सिडाइज्ड फीस भरते हैं। इन्होंने भी दिल्ली पुलिस के हाथों अपनी छाती पर लाठी और बूट खाये। जबकि पुलिस को पता था कि वे दृष्टिहीन हैं । अब वे एम्स में भर्ती हैं ।
पिछले दो तीन हफ्तों से मीडिया के एक वर्ग ने जेएनयू स्टूडेंट्स के खिलाफ झूठा और सिलेक्टिव प्रचार शुरू कर दिया । सोशल मीडिया पर भक्तगणों और आईटी सेल द्वारा पैदा किये गए हैंडल्स ने जेएनयू के छात्रों के झूठे फोटो और मीम्स फैलाये । छात्रों की उम्र और चरित्र को लेकर भद्दे झूठ कहे। जबकि दिलचस्प बात यह है कि सत्ताधारी भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी के जेएनयू यूनिट भी पूरी तरह इस विरोध का समर्थन कर रहा है और बाकायदा विरोध प्रदर्शनों में भाग भी ले रहा है।
आखिर मुद्दा है क्या?
दरअसल जेएनयू प्रशासन ने छात्रों की फीस बढ़ाने का निर्णय लिया था जिससे *शिक्षा और होस्टल की फीस में 600% की बढ़ोतरी हुई है।* जहां छात्र पहले 12 हजार रूपये सालाना फीस भरते थे।
जिसमें पढ़ने ,रहने, खाने,का सब खर्च निकल जाता था, वहीं नई फीस के चलते छात्रों को 60 से 66 हजार रुपये सालाना की फीस भरनी होगी।जेएनयू में दाखिल छात्रों में से *43% ऐसे छात्र हैं जिनके परिवारों की मासिक आमदनी 12 हजार रूपये से कम है।* एक ऐसा परिवार जो साल का 1.4 लाख रुपया कमाता है वो एक बच्चे की पढ़ाई पर 60-70 हजार रुपये खर्च कैसे करेगा ? 43%छात्रों में से 25% गरीबी रेखा के नीचे आनेवाले परिवारों से हैं । बीपीएल का डेटा हर राज्य से अलग है, लेकिन एक सरकारी वेब साइट के मुताबिक 2250 रूपये से कम मासिक आय वाले सभी बीपीएल में आते हैं। बीपीएल छात्रों को दी गई छूट के तहत भी नई फीस के चलते उन्हें 4000 रूपये महीना भरना होगा।
गणित ही बता रहा है कि ये नया फीस स्ट्रक्चर छात्रों के भविष्य के लिए यमदूत है। *जान लें कि जेएनयू में 55% छात्र लड़कियां हैं।* नए फीस स्ट्रक्चर की गाज सबसे पहले इन छात्राओं पर पड़ेगी। क्योंकि भारत जैसे देश में अगर बेटा और बेटी के बीच चुनना पड़े कि खर्च किस पर करना है तो ज्यादातर परिवार शायद बेटे को पढ़ाएंगे। कई दिनों तक छात्र जेएनयू के अंदर ही विरोध करते रहे, घेराव किया, नारे लगाए, पर जेएनयू वीसी एम जगदीश ने उनकी एक ना सुनी, बल्कि कई हफ्तों से कैम्पस छोड़ लापता हो गए। अपने भविष्य को लेकर चिंतित छात्रों ने जब विरोध कर 18 नवम्बर को सुबह संसद की ओर एक शांतिपूर्ण मार्च निकाला तो दिल्ली पुलिस ने कई छात्रों को गिरफ्तार किया और बर्बरता से पीटा भी। ये सवाल उठाना जरूरी है कि जेएनयू के छात्रों ने ऐसा क्या पाप कर दिया जो मीडिया , सोशल मीडिया के नफरती और कुछ संघी वक्ता उनको इतना कोस रहे हैं? क्या शिक्षा हमारा संवैधानिक हक नहीं है? *क्या भारत जैसे देश में जहां 53.7% आबादी मल्टी डायमेंशनल पॉवर्टी यानी बहु पहलू गरीबी का शिकार है, क्या ऐसे देश में अच्छी क्वालिटी की उच्च शिक्षा सिर्फ अमीरों और समृद्ध परिवारों के नसीब में हो ये सही है?* क्या उच्च शिक्षा सिर्फ अमीरों के नसीब में आने वाली वस्तु होनी चाहिए?
*शिक्षा का हक हमारे संवैधानिक मूल अधिकारों में से एक है ।* और जो भी सरकार सत्ता में है उसकी जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा को समान रूप से देश के हर छात्र , चाहे वह जिस भी तबके के हो , उस तक पहुंचाए । इसलिए जरूरी है कि उच्च शिक्षा को सरकार सब्सिडाइज करे। उसपर बजट में फिलहाल सिर्फ 3% खर्च करती है , जिसे बढ़ाये।उच्च शिक्षा को निजी धंधे की तरह मुनाफे के लिए या कॉस्ट रिकवरी मॉडल की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए । खासकर भारत जैसे गरीब देश में , शिक्षा को एक इन्वेस्टमेंट के रूप में देखा जाना चाहिए । *मुफ्त में अच्छी शिक्षा देना , देश के भविष्य में इन्वेस्ट करना है*।यूरोप के विकसित देश यह बात समझते हैं, इसलिए वहां के कई देशों में उनके नागरिकों के लिए शिक्षा मुफ्त है। वे इसे अपने ह्यूमन रिसोर्स में इन्वेस्टमेंट मानते हैं। जेएनयू एक ऐसा संस्थान है जिसने अपनी कम से कम फीस और एडमिशन पॉलिसी के चलते न जाने कितने गरीब छात्रों को मौका दिया है, ताकि उनका सन्दर्भ उनके लिए बेड़ी न बन जाये । शिक्षा एक ऐसा वरदान है जो आपको अपने जन्म के यथार्थ से ऊपर उठने का मौका देता है । *शिक्षा परिवारों को पीढ़ी दर पीढ़ी जारी गरीबी के चक्रव्यूह से निकालने की ताकत रखती है।* मैं जब जेएनयू में थी , तब हमारे एक सीनियर ने आईएएस का एग्जाम पास किया था। उनके पिता जी तमिलनाडु में हाईवे पर टायर ठीक करने का काम करते थे । एक और लड़की थी जिसके माता पिता बिहार में दिहाड़ी मजदूर थे और आज वह लड़की कालेज में टीचर है। मेरा करीबी एक दोस्त झारखंड के एक गांव से था।उसके पिता जी एक फैक्ट्री में काम करते थे । 4000 रूपये महीने की कमाई से वे 1000-1000 रूपये जेएनयू में पढ़ रहे अपने 3 बेटों की फीस के लिए भेजते थे। बाकी बचे 1000 रूपये में गांव का घर चलता था। उनके तीनों बेटे आज अलग -अलग नौकरियां कर रहे हैं। एक ने इंग्लैंड जाकर पोस्ट डॉक्टरेट किया है।
ये मनोहर कहानियां नहीं,जेएनयू की हकीकत है। *ये एक खूबसूरत संभावना है, जो उच्च शिक्षा को सब्सिडाइज करने से हकीकत बन सकती है। जेएनयू के छात्र दरअसल सिर्फ अपनी निजी लड़ाई नहीं बल्कि इस देश में मध्य , निचले और गरीब वर्ग में पैदा हुए हर बच्चे के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं । उन्हें कोसने,उनका मजाक उड़ाने की बजाय *हमें मांग करनी चाहिए कि इस देश में हर प्रान्त में दासियों जेएनयू बनें।* क्योंकि शिक्षा किसी रईसजादे की बपौती नहीं , भीख में दी गई वस्तु नहीं, बल्कि हमारा हक है। और सबका जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाओ

वर्तमान सरकार के शासन के पांच साल देश और जनता के लिए पूरी तरह से सत्यानाशी साबित हुए हैं
इस बार का चुनाव स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि संविधान खतरे में है
संविधान में समाविष्ट धर्मनिरपेक्ष , जनतांत्रिक गणतंत्र का  भविष्य दांव पर लग गया है
भाजपा -नीत एनडीए सरकार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को अभूतपूर्व तरीका से धारदार बनाने का काम कर रही है
एनडीए हमारे समृद्ध , विविधतापूर्ण सामाजिक ताने बाने के सौहार्द्र को छिन - भिन्न कर रहा है
5 सालों  में भाजपा सरकार ने तमाम संवैधानिक सत्ताओं तथा प्राधिकारों के खिलाफ नंगा और मुसलसल हमला किया है
भाजपा फिर आती है तो यह हमारे संविधान के आधार स्तम्भों को और भी कमजोर कर देगी।  धयान रहे वोट डालते वक्त
लोगो इस सरकार को हराओ
धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाओ
वामपंथ को मजबूत करो
और
लाल झंडे पर विश्वास धरो