मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

ये शामेगम मुसलसल तो नहीं है संत बेलैंटाइन!


रामप्रकाश त्रिपाठी
बेचारे बजरंग दल वाले परेशान हैं। सांस्कृतिक पुलिसिंग के मौके कम हो गए हैं। बजरंगियों के अलावा श्रीराम सेना और विहिप का काम भी सिमट गया है। 14 फरवरी सिर पर है-बैलैंटाइन डे! यानि प्रेम के प्रगल्भ इजहार का दिन। इसी दिन वे पबों, होटलों, रेस्तराओं, पार्कों, नदी तालाब के किनारों पर दबिश दिया करते थे। सनसनीखेज प्रेस फोटोग्राफर और चंचल चैनलिये कैमरामैन उनके साथ होते थे। वे प्रेमी प्रेमिकाओं को इस दिन अजब गजब सजायें दिया करते थे। बाजवक्त तो भाई बहिन को पीट पीट कर उनसे कबूल करवा लिया कि वे प्रेमी प्रेमिका हैं। मार से भूत भागते हैं, सो उन बेचारों ने भी कान पकड़ कर उठक बैठकें लगा दीं। खूब छपे अखबारों में इन सांस्कृतिक थानेदारों के अभद्र मुद्राओं के साथ फोटो। उन्होंने कुछ ग्रीटिंग्स की दुकानों पर भी तबाहियां ढाईं। नतीजा यह कि बाजार और बजरंगियों में छाया युद्ध शुरू हो गया।
बजरंगी डाल डाल तो बाजार वाले पात पात। डी डीकंस्ट्रक्शन के जमाने में उन्होंने बैलेंटाइन डे को भी डीकंस्ट्रक्ट कर दिया। एक दिन को फैलाकर सात दिन में बांट दिया। रोज डे, चाकलेट डे, प्रॉमिस डे, टेडी डे, किस डे, हग डे और बैलेंटाइन डे। पहले एक दिन का हंगामा मंसूब था। अब एक की जगह सात दिन का रंगारंग जश्न है। सात दिन का चमकीला बाजार है। हफ्ते भर चन्द्रकलाओं की तरह प्रेम का बढ़ता उफनता ज्वार है। फूल बेचने वालों, चाकलेट और टेडी बेचने वालों, कार्ड और गिफ्ट बेचने वालों की चांदी ही चांदी है। पहले प्रेम सिर्फ प्रगल्भ था अब बजरंगियों की चुनौती स्वीकार करके खुला खेल फर्रूखाबादी हो गया है।
अफसोस कि प्रेम का जादुई, मृसण और कोमल दिव्य अहसास बाजार के हत्थे चढ़ गया है। जिसने उसकी स्वाभाविकता और परिपाक का प्राकृतिक तरीका बदल दिया है और उसे देह की मशीन में सीमित कर दिया है।
सारे नैतिकता के ढकोसलेबाज, सारे स्वयंभू शुद्धतावादी, सारे संस्कृति और धर्म रक्षक दल प्रेम पर ही लठ्ठ लेकर क्यों पीछे पड़ जाते हैं? धर्म और संस्कृति की बुनियादी ही प्रेम है। तब प्रेम संस्कृति और धर्म विरोधी कैसे हो गया? धर्म ध्वजियों ने, धर्मप्राण ठेकेदारों ने प्रेम को धर्म संस्कृति का विरोधी कैसे ठहरा दिया? बचपन में बुजुर्ग किसी प्रेम विवाह या प्रेम पसंग पर बिना टीका टिप्पणी किए एक त्रिपदीय सुना दिया करते थे-
नींद न देखे टूटी खाट
भूखा न देखे जूठा भात
इश्क न देखे जात कुजात
जाहिर है तमाम सहमतियों-असहमतियों, नानुकुर और आपत्तियों के बीच भी यह कहावत समाज द्वारा प्रेम को जाति पांति से परे मानने की समझदारी भरी सूचना देती नजर आती है। आज प्रेम दुर्घटनाग्रस्त है। एक ओर उसे आनर किलिंग में शहादत देनी पड़ रही है और दूसरी ओर सांस्कृतिक पुलिसिंग में उसे बेइज्जत किया जा रहा है। तालिबानी हों या जातिवादी, धर्मरक्षक हों कि संस्कृति रक्षक सबका नजला प्रेम पर फूट रहा है और शिकार के निशाने पर हैं मासूम प्रेमी और सुकुमार प्रेमिकायें।
कल तक ऐसी हालत नहीं थी। हालांकि समाज तुलनात्मक रूप से पिछड़ा हुआ था। तो भी अरूणा-आसफअली, जहान आरा-जयपाल सिंह से लेकर इरफाना-शरद जोशी, नीलिमा अजीम-पंकज कपूर तक को जोडिय़ों का समाज में बड़ा मान सम्मान रहा है। आज तो उनके जज्बे आनर किलिंग के शिकार हैं। समझमें नहीं आता कि हम सामाजिक तौर पर आगे बढ़े हैं या पीछे खिसके हैं। सांस्कृतिक हुए हैं या और ज्यादा असांस्कृतिक? सभ्यता की सीढिय़ा चढ़े हैं या सभ्यता के पायदानों से लुढककर नीचे आये हैं?
स्त्री का जरा आंचल ढलक जाता है तो इस्लाम से लेकर हिंदू धर्म तक सब खतरे में पड़ जाते हैं। आदमी की अश्लीलता भी हमारे समाज में अनदेखी रहती है। हालांकि हमारे मनु महाराज ने बहुत पहले ही स्त्री स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा दी थी-बचपन में वह पिता के अधीन रहे, जवानी में पति की पहरेदारी में रहे और बुढ़ापा आये तो पुत्रों के रहमोकरम पर गुजारा करे-स्त्री स्वातंत्र्य न मर्हयति! यानि स्त्री के लिए स्वतंत्रता नहीं है। विडंबना यह है कि मनु का मंत्र हमारी चेतना में जिद के जिन्न की तरह समाया हुआ है। पता नहीं स्त्री की स्वतंत्रता और स्त्री की शिक्षा हर धर्म के पहरेदारों का रास्ता क्यों रोकती है? फिर यह मामला तो प्रेम का है। सांस्कृतिक पुलिसियों के कुंठित पहरों के चलते प्रेम क्यों न अपराध बन जाये। बेचारे बैलेंटाइन! हमारे देश में वे अपसंस्कृति के प्रचारक के रूप में बदनाम कर दिए गए। वे सचमुच संत थे। एक तानाशाह द्वारा प्रेम पर लगाये प्रतिबंध का उन्होंने विरोध किया था। सार्वजनिक रूप से विवाह करके प्रेम के विरूद्ध खड़े कानून को तोड़ा था। परिणाम स्वरूप जेल की यातनायें सही थीं। वक्त के साथ उनके पक्ष में जन सैलाब उमड़ पड़ा और उनकी स्मृति में 14 फरवरी को प्रेम दिवस मनाया जाने लगा। जिसे हम बैलेंटाइन डे के नाम से जानते हैं।
भारत में प्रेम के अधिकार की जंग बड़ी पुरानी है। यूँ तो कई रामायण, महाभारत के और पौराणिक संदर्भ दिए जा सकते हैं लेकिन फिलहाल याद करें मीरा बाई को। उन्होंने अपनी ससुराल में-मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई, का राग अलापा था और कहा था-संतन ढिंग बैठि बैठि लोक लाज खोई। अब तो बेल फैलि गई आनंद फल होई! मीरा के वक्त आनंद फल ने आतंक पर विजय पा ली थी और मीरा को प्रेम और उपासना का अधिकार मिल गया था। पर आज? आज आनंद पर, प्रेम पर, प्रेमाभिव्यक्ति पर आतंक के पहरे हैं-क्यों? बाजार ने हालांकि घुमावदार रास्ता तो आतंकवाद से निपटने का निकाल लिया है। पर किस कीमत पर? प्रेम को व्यक्त करने वाली कोमल अनुभूतियॉं महॅंगे कार्डों की शक्ल में हसरत भरे बाजार में बिकने का आ गई हैं। बेशक यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मगर चलो मानलें-ये शामेगम मुसलसल तो नहीं है संत बैलेंटाइन!
क्या तेरे ख्वाब ने भी छेड़ा है सितार
सीने में उड़ रहे हैं नग़मों के शरार
ध्यान आते ही साफ बजने लगते हैं कान
है याद में तेरी वो खनक वो झनकार (फिराक)

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