बुधवार, 24 जुलाई 2019

naukree

कमलू --रमलू इस बेरोजगारी के बारे मैं कुछ सोचना चाहिए
रमलू -- सोचना के सै | चुनाव आगे |
कमलू --फेर
रमलू --फेर के कट्ठे होकै मांग करो अक जो पार्टी एक लाख नौकरी आये साल देवैगी , जनता वोट भी उसनै देवैगी
कमलू -- या के होवण की बात सै
रमलू -- मनै बना चीफ मिनिस्टर , जै नहीं करकै नहीं दिखा द्यूं तो
कमलू -- पी तो नहीं राखी सै
रमलू -- मनै कोणी पी राखी , जनता नै पी राखी सै |  जिस दिन उतर ज्यागी उस दिन एक लाख साल की नौकरी पक्की 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

सामाजिक न्याय


रणबीर
सामाजिक न्याय को परिभाषित करना मुश्किल काम है  सामाजिक न्याय का मतलब है  कि  समाज में  सभी  मनुष्यों  को  चाहे वे स्त्री हों या पुरुष हों,इस धर्म के हों या उस धर्म के हों,इस जाति के हों या उस जाति के होंसबको समान रूप से  जीने का और  अपना विकास करने का मौका मिलना चाहिये। ऐसा पूरी तरह तभी हो सकता है  जब समाज मैं वर्ग भेद समाप्त होमनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। शायद 1935 में  इस शब्द का इस्तेमाल किया  गया जब संयुक्त राष्ट्र्र मैं संयुक्त राष्ट्र्र सामाजिक
सुरक्षा अधिनियम पास किया  गया। बेरोजगारीबीमारीशिक्षालैंगिक समानतावृद्धावस्था के लिए बीमा आदि मुद्दे शामिल किये 
गये थे
     1938 में  न्यूजीलैंड में  प्रयोग हुआ तथा वृहद सामाजिक सुरक्षा पद्धति का विकास किया  गया। आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव विकास औ राष्ट्र्र विकास को भी शामिल किया गया। इसकी अलग-अलग अवधारणाएं आज भी मौजूद हैं  दलितोंस्त्रियोंआदिवासियोंगरीब सवर्णों आदि को विभिन्न प्रकार के आरक्षण देकर उन्हें 
सामाजिक अन्याय से बचाया जा सकता है। लेकिन क्या यह  समझ सही है क्या वास्तव मैं सामाजिक न्याय की मांग पूरी नहीं हो सकती  
जब तक वर्गवर्णजातिलिंगधर्मसम्प्रदाय इत्यादि के आधार पर किये  जाने वाले भेदभाव को समाप्त  किया जाएसवाल यह  भी है  कि  क्या  वर्तमान व्यवस्था को कायम रखते हुए लोगों को सामाजिक न्याय उपलब्ध करवाया जा सकता  है क्या ये  जरूरी नहीं कि  वर्तमान समाज व्यवस्था को बदलकर बराबरी औ भाईचारे वाली ऐसी न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था कायम की  
जाये  जिसमें  किसी के द्वारा किसी का दमन और उत्पीडऩ  होफेर सवाल उठता  है  कि  क्या  यह  सम्भव है ? अगर  हां तो कैसे अन्याय का विरोध और न्याय की मांग असल में  वही  कर सकते  हैं  जो यह  बात जानते  हैं  कि  न्याय क्या  है सामाजिक न्याय असल में क्या  है  इस बात को सही परिप्रेक्ष्य मैं समझना बहुत जरूरी है  एक तरफ यह  सवाल देश की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा हुआ है तो दूसरी  तरफ किसी देश की अर्थव्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था से भी गहन रूप से जुड़ता है। क्या दलितों को सवर्णों के विरुद्धपिछड़ों को अगड़ों के विरुद्धस्त्रियों को पुरुषों के विरुद्ध
एक धर्म सम्प्रदाय को दूसरे धर्म सम्प्रदाय के विरुद्ध लोगों को लड़ाकर किसी न्यायपूर्ण समाज 
व्यवस्था की स्थापना की जा सकती है? यदि नहीं तो वर्तमान को सही सही विश्लेषित करना बहुत जरूरी हो जाता है। आज का दौर समझना बहुत जरुरी है। वर्तमान में भूमंडलीकरणउदारीकरण तथा निजीकरण की पूंजीवादी प्रक्रियाओं के चलते हमारे देश पर एक तरफ माओवाद का खतरा मंडरा रहा  है  तो दूसरी तरफ धर्म औ संस्कृति के नाम पर सामाजिक न्याय की पुरानी व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने वाली फासीवादी शक्तियों का
 प्रभाव बढ़ रहा है। इसके विरुद्ध एक स्वस्थप्रगतिशीलधर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक राष्ट्रवाद को अपनाना हमारे लिए जरूरी हो गया है क्योंकि नवसाम्राज्यवादी और नवफासीवादी शक्तियों की मार अंतत
उन्हीं लोगों पर पडऩी है जो सामाजिक अन्याय के शिकार हैं। मगर यही ताकतें धर्मसम्प्रदाय,  वर्णजातिरंगलिंगनस्लभाषा औ क्षेत्र के आधार पर 
लोगों  को बांटने  और  जनता को  एकजुट  होने  देने  मैं कामयाब हो रही  हैं  इसी हालत मैं सामाजिक न्याय केलिए किये  जाने वाले संघर्ष का ऐसा कौनसा रूप हो सकता  है  जो देश को  बाहरी गुलामी से  औ जनता को  भीतरी अन्याय से  बचा सकताहै बड़ा और 
जटिल सवाल है  भारत मैं सामाजिक न्याय की बात करने  वाले बहोत से लोग वर्ग की बात नहीं  करते बल्कि वर्ण की बात करते  हैं  ये वर्ण व्यवस्था को ही  सामाजिक अन्याय का मूल कारण समझते  हैं  ये ऊंची जातियों के खिलाफ नीची जातियों की राजनीति की बात करते  हैं   यह तो विडम्बना ही है कि ऊंची जाति के लोग यह समझते हैं कि उन्हें दलित को नीचा समझने का हक सै। उनकी इस दुर्भावना को दूर करना बहुत जरूरी है  कैसे ? फि मुश्किल जगह है  मूल सवाल यह  हैकि  हमनै जातिवाद को दूर करना है  या  जारी रखना है जातिवादी राजनीति से तो यह  खत्म होने  से रहा । इसको  खत्म करण के  लिए  जाति के आधार पर नहीं हमको  वर्ग के आधार पर संगठित होना बहोत जरुरी है  अनेक देशों  के  अनुभव बताते  हैं  कि  जब  तक  गरीब किसान और खेत मजदूर मिलकर 
संघर्ष नहीं करते तब तक दोनों  की दशाओं मैं मूलभूत परिवर्तन सम्भव नहीं है ।  कुछ लोग ये  भी कहते  हैंकि  सामाजिक न्याय का नारा सामाजिक अन्याय को जारी रखने  के लिए  दिया गया है  समाज के अगर  वे लोग जिन जिन के खिलाफ अन्याय हो रहा  है  वे मिलके  संघर्षकरें   तो सामाजिक न्याय का नारा अन्याय को बनाए रखने का काम नहीं करैगा। हरियाण ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा चलाया जा रहया समाज सुधार आन्दोलन नये नवजागरण के विचार से लैस होकर इस काम मैं जुटा  है  समाज के सब तबकों खासकर आधारभूत तबकों को शामिल करके इस तरफ कदम बढ़ाये जा रहे हैं। आप भी साथ दें। ‘दूसरी दुनिया सम्भव है ’ का विचार आपके सहयोग तै आगे  बढ़ सकता  है \